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Thursday, 25 June 2020

घमंड कर घमंड कर - गोपाल खेताणी





घमंड कर घमंड कर
घमंड कर घमंड कर
तु शत्रु के खुन से
क्रोध को प्रचंड कर॥

हे वीर तु शान है
देश की तु आन है
नायक है आदर्श तु
सब के दिल की जान है
रंग केसरी सजा तु शत्रु को भस्म कर
घमंड कर घमंड कर
घमंड कर घमंड कर॥

देश तेरे साथ है
तेरे नाम पे कुरबान है
सेना की दहाड सुनने
ये दिल अब बैताब है
दुश्मन के रक्त से धरा को तु तृप्त कर
घमंड कर घमंड कर
घमंड कर घमंड कर॥

तीनो सेना हमारी माने
दुश्मनो का काल है
देख ले ओ बौने शत्रु
हमारा क्या भौकाल है?
रण में तांडव मचा महाकाल को प्रसन्न कर
घमंड कर घमंड कर
घमंड कर घमंड कर
तु शत्रु के खुन से
क्रोध को प्रचंड कर॥
जय हिंद – जय हिंद की सेना!

~ गोपाल खेताणी
copyright -  2020

आप ये गीत यु -ट्युब पर भी देख सकते हैं!

https://www.youtube.com/watch?v=LYsHbTZxbqc&

Monday, 18 May 2020

माँ तुझे सलाम!



नमस्ते स्नेही जन!
आप सब ने जन्मदिवस की शुभकामनाएं दी उसके लिए तहे दिल से शुक्रिया।

हर साल मैं भगवान के प्रति आभार व्यक्त करता हूं, साथ साथ ये भी प्रार्थना करता हूं की हमारे देश के वीर सैनिको की रक्षा करे जो हमारे लिए देश के हर कोने में डटे हुए हैं।

जन्मदिन पर शहीद वीर को  जितना ॠण चूका पाउं उतना कम! बस भगवान से यही प्रार्थना की सेना को शकित दे और हमें भी शक्ति दे की हम सेना के लिए, सैनिको के लिए कुछ कर पाएं।

ये पोस्ट मैं इस लिए नहीं  लिख रहा की 'देखो मैने हर साल कि तरह इस साल भी कितना बढीया काम किया आज के दिन!', पर इस लिए लिख रहा हूं की आप भी इस मुहीम में जुडीए। अपने जन्मदिन पर आप भी https://bharatkeveer.gov.in/ वेबसाइट पर अपना ॠण अदा करे।




शहीद वीर सत्यपाल सिंह बचु सिंह परमार को मेरा  और  समस्त देशवासीयो का शत शत नमन। राष्ट्र की सेवा करते हुए उन्होंने सर्वोच्च बलिदान दीया। देश आप की शहादत को याद रखेगा सत्यपाल सिंह जी।

मित्रो, आप भी वीर सैनिको की शहादत को याद रखीएगा और हो सके तो आप भी https://bharatkeveer.gov.in/  पर ॠण अदा करीएगा।



फीर से एक बार जन्मदिन की शुभकामनाएं देने के लिए धन्यवाद।
जय हिन्द... जय हिन्द की सेना!
वंदे मात्‌रम ! भारत माता की जय।

~ गोपाल खेताणी


Thursday, 7 May 2020

मेरा भारत महान – नाना फडनवीस

Nana Fadnavis. (Representative Pic: Wikimedia Commons)

अंग्रेज जिन्हें “मराठों का मैकियावेली” कहते थे वो थे पेशवा का बाहोश, बलवान और बेजोड मंत्री नाना फडनवीस जी।

१२ फरवरी १७४२ को बालाजी जनार्दन भानु का जन्म सतारा महाराष्ट्र में हुआ। सब लोग बालाजी को प्यार से “नाना” पुकारते थे।

नाना के दादा बालाजी महादजीने मुगलों से पेशवा को बचाने के लिए अपनी जान का बलिदान दे दिया। पेशवा की सिफारिश पर छत्रपति शाहूजी महाराजने उन्हे “फडनवीस” (अष्टप्रधान में से एक) की उपाधी प्रदान की।
नाना को ये उपाधी अपने दादाजी से प्राप्त हुइ।

मराठा साम्राज्य के चौथे पेश्वा माधवराव के लिए ना फडनवीसजी मंत्री के रुप में कार्य रत थे।
१७६१ में पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद, नाना फड़नवीसजी ने एक मंत्री के रूप में प्रमुखता से मराठों को अपनी प्रतिष्ठा और शक्ति हासिल करने में मदद की, जो पानीपत में युद्ध में काफी हद तक क्षीण हो चुकी थी।
उन्होंने राज्य के अन्य विश्वासपात्र मंत्रीयो के साथ मिलकर स्थिति को सही दिशा की ओर बढ़ाया और शासन प्रबंध को फिर से दुरुस्त करने में अहम भूमिका निभाई।

नाना फड़नवीसजी के दिशानिर्दोशों में मराठा सेना ने हैदराबाद के निजाम पर जीत हासिल की, जिसने मराठा साम्राज्य के सम्मान और प्रतिष्ठा को नया आयाम दिया।

पेशवा माधव राव की मौत के बाद उनके छोटे भाई नारायण राव पेशवा बने।
मगर नारायण राव अपने भाई के समान समझदार और धैर्यवान नहीं थे. ऐसे में बालाजी बाजीराव के भाई और नारायण राय के चाचा रघुनाथ राय के पास मौका था कि वह शासन पर कब्जा कर लें।
आखिर रघुनाथ राव खुद भी तो पेशवा बनना चाहते थे।

इसलिए उन्होंने पेशवा नारायण राय के विरुद्ध षडयंत्र रचने शुरु कर दिए. लेकिन रघुनाथ राव और पेशवा के बीच नाना फड़नवीस खड़े थे. इन्होंने एक-एक कर रघुनाथ राव की कई चालों को बेअसर कर दिया।
पर १७७३ में रघुनाथ राव ने एक साजिश के तहत नारायण राव की हत्या कर खुद पेशवा बन गए।
लेकिन दूसरी ओर नारायण राव की पत्नी गंगा बाई उस समय गर्भवती थी और नाना फड़नवीसजी चाहते थी कि उनका वारिस ही पेशवा बने।

इसलिए नाना फड़नवीसजी ने बारभाई काउंसिल का निर्माण किया। जिसके तहत उन्होंने अपने अलावा ११ अन्य मराठा सरदारों को एकत्रित किया, जो रघुनाथ के विरुद्ध थे।
बारभाई काउंसिलने रघुनाथ राव को पेशवा के पद से हटाकर 40 दिन के अंदर माधव राव द्वितीय को नया पेशवा नियुक्त कर दिया।
हालांकि, माधव राव केवल नाम के पेशवा थे, जबकि असल में शासन की कमान नाना फड़नवीसजी के हाथों में थी.

नाना फड़नवीसजी दूरदर्शी थे, वह इस बात से भलिभांति परिचित थे कि मराठों के सबसे बड़े दुश्मन अंग्रेजी और फ्रांसीसी व्यापारी हैं। इसलिए नाना फड़नवीसजी ने इन पर नजर रखने के लिए गुप्त जासूसों का एक विभाग बनाया, जो इनकी हर छोटी बड़ी गतिविधियों पर नजर रखता था।
लिहाजा, अंग्रेज भी जानते थे कि फड़नवीस उनके लिए बड़ा खतरा हैं और उनके रहते वह मराठा साम्राज्य को तोड़ नहीं सकते।
इसलिए उन्होंने कई बार फड़नवीसजी को बदलने की बात पेशवा के समक्ष रखी, मगर उन्हें कभी भी समर्थन नहीं मिला।

इसी बीच मराठा साम्राज्य के गद्दार शासक रघुनाथ राव ने एक बार फिर से पेशवा बनने की कोशिश की।
इसके लिए उसने अंग्रेजी सेना की मदद ली और मराठों पर हमला बोल दिया।
लेकिन नानाजी ने समझदारी दिखाते हुए निजाम और भोंसले से संधि कर ली. जिसके चलते युद्ध का अंत संधि के रूप में निकला।

साल १७८२ में मराठों और अंग्रेजों के बीच संधि हुई। सालबाई की सन्धि, मई 1782 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी और महादजी शिन्दे के बीच हुई थी।  महादजी शिंदे भी बेजोड मराठा सरदार थे। कइ पुस्तक में लिखा गया है की महादजी और नानाजी के बीच झगडा था पर इतिहास कुछ और ही कहता है। दो विलक्षण प्रतिभाओं के विचार अलग हो सकते है, मगर उनका लक्ष्य नहीं। तभी नानाजी और महादजीने मिलकर इतना बडा कार्य सफल कीया।

फ़रवरी १७८३ में पेशवा की सरकार ने इसकी पुष्टि कर दी थी। इसके फलस्वरूप १७७५  से चला आ रहा प्रथम मराठा युद्ध समाप्त हो गया।सन्धि की शर्तों के अनुसार साष्टी टापू अंग्रेज़ों के अधिकार में ही रहा।
अंग्रेज़ों ने राघोवा (रघुनाथ राव) का पक्ष लेना छोड़ दिया और मराठा सरकार ने इसे पेंशन देना स्वीकार कर लिया। अंग्रेज़ों ने माधवराव नारायण को पेशवा मान लिया और यमुना नदी के पश्चिम का समस्त भू-भाग महादजी शिन्दे को लौटा दिया। अंग्रेज़ों और मराठों में यह सन्धि २० वर्षों तक शान्तिपूर्वक चलती रही।

१७९५ में उसने मराठा संघ की सम्मिलित सेनाओं का निज़ाम के विरुद्ध संचालन किया और खर्दा के युद्ध में निज़ाम की पराजय हुई। फलस्वरूप निज़ाम को अपने राज्य के कई महत्त्वपूर्ण भूभाग मराठों को देने पड़े।
१३ मार्च, १८०० में नाना फड़नवीसजी की मृत्यु हो गई और इसके साथ ही मराठों की समस्त क्षमता, चतुरता और सूझबूझ का भी अंत हो गया।

नाना फड़नवीसजी ने कभी किसी पद या उपाधि की कामना नहीं की। उनकी रुचि केवल मराठा साम्राज्य की प्रगति में थ। जब-जब राज्य में अस्थिरता आई नाना फड़नवीसजी ने हालातों पर काबू पाया और उन्हें फिर से स्थिर किया।

इतिहास के पन्नो पे नाना फडनवीसजी का नाम सुनहरे अक्षर में अंकित रहेगा।

~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 5 May 2020

अग्नि की ऊड़ान - श्री ए.पी.जे अब्दुल कलाम

पुस्तक परिचयः अग्नि की ऊड़ान
लेखकः भारत के अब तक सर्वाधीक चहीते राष्ट्रपति एवम्‌ मिसाइल मेन श्री ए.पी.जे अब्दुल कलाम (लेखन सहयोगः अरुण कुमार तिवारी)
WINGS OF FIRE का हिन्दी अनुवाद आर्येंद्र उपाध्याय


लिडर वो है जो निष्फलता अपने कंधो पे लेता है, और सफलता अपनी टिम के सभ्यो में बांट देता है ये हमें कलाम जी के आचरण से शिखना चाहिए।

ए.पी.जे अब्दुल कलाम ऐसी विराट प्रतिभा है की अगर वे जब लिखे तो हर एक शब्द हमारे मन मस्तिष्क में अंकित हो जाए। कलामजीने अपने बचपन से लेकर जब वो ६० साल के हुए तब तक के अपने जिवन सफर का दर्शन इस पुस्तक के माध्यम से करवाया है।

कलाम जी का जन्म आर्थिक रुप से साधारण लेकन आध्यात्मिक विचारो से असाधारण परिवार में रामेश्वरम में हुआ था। कलामजी अपने पिता और उनके विचारो से प्रभावीत थे। और क्युं ना हो, पुस्तक में कलामजी के पिताजी, जो अपने सुंदर विचार बालक कलाम को सुनाते है वो हमें भी प्रभावित करते है।

जैसे की
“जब संकट या दुःख आए तो उनका कारण जानने की कोशीश करो। विपत्ती हमेशा आत्मविश्लेषण के अवसर प्रदान करती है।“

कलामजी और उनके बहनोइ जलालुदीन, जो उनसे उम्र में काफी बडे थे वो उनके अच्छे मित्र बने, जब घूमने निकलते थे तो शिवमंदीर की प्रदक्षीणा भी करते थे। धर्मनिरपेक्षता का इससे बडा उदाहरण क्या होगा?
जलालुदीनने ही कलामजी को पढने के लिए प्रोत्साहीत किया।

दूसरे प्रोत्साहक थे कलामजी के चचेरे भाई शम्शुदीन जो न्यूझ पेपर एजंसी चलाते थे, जिनके साथ बचपन में कलामजी ने काम किया। कलाम जी की मां और दादी बच्चों को रामायण एवम्‍ पैगंबर साहब की कहानिया सुनाती थी इसका असर थी कलामजी के जिवन पे पडा है।

विग्यान के उनके शिक्षक जो शिव सुब्रह्मण्य अय्यर जो एक सनातनी ब्राह्मण थे उन्होंने कलामजी को खाने पे बुलाया और उनके साथ खाना खाया, ये बात का भी बाल कलाम के मन पे आजिवन असर रहा।

रामेश्वरम से बाद में कलाम जी रामनाथपुरम पढने गये। और फिर वहां से त्रीची। यहां पर कलामजी को भौतिकशास्रमें रूची होने लगी। पर तुंरत ही कलामजी को ग्यान हुआ को उन्हें इंजिनियरींग में जान चाहिये था। MIT में एडमिशन तो मिला लेकिन फिस के लिए पैसे नहीं थी तब कलाम जी की बहनने अपने गहने बेच दिये और उन पैसो से कलामजी फिस दे पाए।

यहां पर कलाम जी ने रसप्रद शब्दो में अपने बचपन, कोलेज काल और तकनिकी ग्यान का वर्णन किया है। कोलेज के बाद कलामजी ने HAL जोइन किया और एक इंन्टर्व्यु के तहत दिल्ही और देहरादून गये। वहां से रुषीकेश गये और स्वामी शिवानंद से मिले। वह प्रसंग़ अद्भूत है। आगे कलामजी ने अपने काम, अपने जिवने के सफर, तकनीकी ज्ञान का विवरण दिया है पर साथ साथ कलामज की आध्यात्मिक विचार का आलेखन जो हुआ है वो हमारे दिल को छू जाता है।

होवर क्राफ्ट के अनुभवो से होते हुए कलामजी कैसे डो. साराभाइ से मिलते है वह विवरण सभी के लिए मार्गदर्शक है।

दुर्भाग्यवश हमारे देश में सिर्फ “हिरो” और “झिरो” है, जिनके बिच एक बडी विकट विभाजन रेखा है।इस स्थिति को बदलना जरूरी है ऐसा कलामजी का मानना था जब भारत की आबादी ९५ करोड थी।

नासा से आने  के बाद कैसे रोकेट, उपग्रह और मिसाइल तकनिक पे काम हुआ वो आसान शब्दो में कलामजी ने समजाय है।साथ में अपने अनुभव को साझा करते हुए कइ सिख भी प्रदान की है।

एस एल वी कि प्राथमिक निष्फलता, संघर्ष इन सभी अनुभवो को कलामजीने साझा किया है वैसी मुसिबते या इससे कम मुसीबते हमारे जिवन में आती है तब हमें कैसे लडना है वो कलामजी के शब्दो से हमें पता चलता है।
एस एल वी के बाद प्रुथ्वी, त्रीशुल, अग्नि मिसाइल के संशोधन और सफलता के विवरण के साथ कलामजी आध्यात्मिक विवरण भी आप को किताब पढने में विवश कर देता है।

विज्ञान में थोडी भी रूची रखने वाले पाठक इस पुस्तक को बडे चाव से पढेंगे ये मेरा मानना है।
वैसे भी सब से चहिते राष्ट्रपति के इस आत्मकथानक समान पुस्तक को कौन पढना नहीं चाहेगा?



~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 22 October 2019

दिवाली – कल आज और कल !


"दिवाली" – ये शब्द कानो में गूंजते ही रंगबिरंगी आभा सब के मनोपटल पर छा जाती है। यह कल्पना अमीर -गरीब, बच्चे – बुढ्ढे – जवान  के बीच अंतर नहीं देखती!

और यही खुशी आप उपर वाली फोटो में देख सकते हो! एस्टर पब्लीक स्कूल में केजी के बच्चोने सब के साथ दिवाली मनाइ! अपने पारंपरीक वस्त्रो में सज धज कर आये बच्चो को टिचरने रंगोली, दिए का महत्व बताया और दिवाली के त्योहार का उत्साह इन नन्हे मुन्ने बालको के मन मंदीर में जिवीत कीया!
(फोटो कर्टसी - एस्टर पब्लीक स्कुल, मयुर विहार, दिल्ही। साभार - दिव्या मेडम) 
अभी तो दिवाली यानी ओनलाइन सेल से खचाखच भरा हुआ बाझार। (ओफलाईन बाजार में भले ही मंदी हो, ओनलाईन अरबो रूपये  कमा लेता है!) अभी तो दिवाली यानी शोपींग मॉलमें लुत्फ उठाने का त्योहार!
दिवाली का मतलब छुट्टियां है तो घर पर ताला लगाने का मौका! (और तस्करशास्त्रीयों का भी!)  हम घर पर हो तो मेहमान आएंगे न? कौन घर पर पकवान बनाएं, मिठाइयां बनाएं, गुजीया बनाएं, घर सजाएं?? छुट्टीयां मिली है तो घूम लेते है कहीं!
ऊपर वर्णित "दिवाली"    सर्व व्यापक नहीं हैलेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार हो रहा है।
क्या मेरी बातें  निराशाजनक लगती हैंचलो कुछ अच्छी बातें करते है। आपको अतीत में डुबकी लगाने ले चलता हूं।
बात शरु करने से पहले बता दुं की गुजराती नव वर्ष दिवाली के दूसरे दीन से शुरु होता है। हम गुजरातीयों के लिए (सब की तरह) दिवाली बहुत मायने रखती है! अब आता हुं मुद्दे पर;
स्थलः 'अनुपम वस्तु भंडार', गुंदावाडीराजकोट, गुजरात। समयखंड 1995-2005
वैसे तो पापा की यह दुकान सिर्फ बुक – स्टेशनरी की है पर पटाखे बेचने का स्थायी लाइसन्स होने पर हम पटाखे बेचते थे। दुकान मेइन मार्केट रोड से थोडी दूर अंदरवाली गली में है। पापा को आसपास में रहते सभी बच्चे “अनुपम” नाम से बुलाते थे क्युंकी उन्हें लगता था की दुकान का नाम मेरे पापा के नाम पर से ही होगा। आज वो बच्चे ३५-४० साल के आसपास होंगे। खैर दिवाली के पांच  - छह दिन पहले  हम पटाखो की बिक्री शरु कर देते थे। जैसा मैने पहले बताया की गुजरातीयों का नववर्ष होता है तो स्कुल में दिवाली की २० दिन की छुट्टी मिलती थी। मैं तब १२ – १३ साल का था और खुशी खुशी पटाखे बेचने दुकान पर जाता था। (लोहाणा के खुन में ही बिझनेस होता है!) 
कई बच्चे दुकान के पास बहुत चक्कर लगाते और पटाखो के रंगीन पोस्टर देख अपनी कल्पना के रंग उसमें भरते। ये बच्चे हमारी बुक – स्टेशनरी के विश्वासु एवम रोजाना कस्टमर थे। (पेन्सील – इरेझर वाले!)
पटाखो के पेकेट मे से कई बार फुलजडी निकल पडती या अनार, जमीन चक्कर पर से रंगीन कागझ निकल जाते। उन पटाखों को पापा एक अलग बक्से में रख देते। मुजे याद है की एक बार एक छोटु पांच का सिक्का ले के दुकान पे आया। पांच का सिक्का मेरे पापा को देकर एक्दम खुशी खुशी तोतलाते हुए बोला, “ अनुपम, पांत ना फटाकीया” – मतलब पांच के पटाखे। और उस के बाद अपनी दोनो कोन्ही टेबल पर टीका उसपे अपना मुंह फिक्स कर सभी पटाखों को आराम से देख रहा था। पापा ने वो जो अलग बक्से में पटाखे रखे थे उसमे से कुछ् पटाखे निकाल उसको दिए। वो पटाखों की किंमत सन २००० के हिसाब से १५ – २० रुपये होगी। मैने फिर पापा की और देखा। वो बोले उसके पापा बगल वाली साबुन की फेकट्री में मझदूर है। इस छोटु को भी तो दिवाली मनानी होगी ना? हां पैसे इस लिए मैने लिये ताकी उसे ये विश्वास रहे की पटाखे मुफ्त में नहीं मिलते। पापा दुकान पे आते भिखारी को भी ऐसे ही उस बक्से में से कुछ दे देते थे। भिखारी के बच्चों की मुस्कान देखने लायक बनती। यहां पर मैं अपने पापा की वाहवाही नहीं कर रहा  और ना ही भिखारीओ को उत्तेजन देने की बात कर रहा हूं। मैं बस इतना कहना चाहता हूं की हम कुछ ऐसा कर पाए की और लोग भी हमारे साथ त्योहार मना पाए।
आज अगर सो रुपये लेकर बाझार में जाकर पटाखे मांगो तो व्यापारी हस देगा। पर तब ऐसा नहीं था। उस समय हम बीस – तीस रुपये के पटाखे भी बोक्स में से निकाल कर दे देते थे। मुख्य उद्देश्य व्यापार करने के साथ मस्ती भुनने का भी था। और ये सीर्फ हम नहीं सभी व्यापारी ऐसा करते थे।
उस समय सब को अपने बजट के अनुसार त्योहार मनाना आता था। उस समय औरते पुराने कपडों के बदले नये बर्तन ख्ररीदती थी। इस ‘एक्स्चेंज’ ओफर का अपने पडोशीयों के साथ ‘ग्रुप डिस्कशन’ करती थी। सडकों के किनारे बैठे हुए रंगोली , दीए वाले के पास से खरीददारी होती थी। लाइटों की चमचमाती रोशनी देखने लोग बाझारों में घूमने निकलते थे। रेडी एवम दुकानो से जूते , चप्पल, कपडें, साज सजावट के सामान खरीदे जाते। दिवाले के दिन अशोक व्रुक्ष (आसोपालव) के पत्ते से बने तोरण (लडी) की खरीददारी होती है। दुसरे दीन नववर्ष पे सब बच्चे तैयार हो कर आस पडोश और सगे – संबंधीओ के घर पर जा के पैर छूते हैं और उनसे आशीर्वाद (लक्ष्मीजी भी! ) पाते। घर के सभी सदस्य मंदीर जा कर फीर एक दूसरे को बधाई देने पहुंचते।
पहले मिट्टी के दिए बेचती बुढ्ढी अम्मा से लेकर सबरस (नमक) बेचते हुए चाचा तक सब दिवाली मनाते थे। उस समय लारी – रेडी में से खरीदने में कोई असहज महसूस नहीं करता था। छोटी छोटी चिजो में कोई क्वालीटी का सवाल भी नहीं होता था।
मगर आज हम क्या कर रहे है? हम किसी के त्योहार की खुशीया छीन तो नहीं रहे ना? ओनलाइन शोपींग और मॉल के चक्कर में कइ लोगों के दिये नहीं जल पाते।
चलो इस दिवाली पे हम औरो की खुशी में भी शामिल होते है। इस दिवाली सब को साथ लेकर चलते है। बच्चे – बुढ्ढे कीसी के दिल को चोट ना लगे ये संकल्प लेते है।
आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाऍ सुरक्षीत रहें , स्वस्थ रहें!
-    गोपाल खेताणी

Saturday, 18 May 2019

देश मेरे.. देश मेरे... मेरी जान है तू !






"देश मेरे.. देश मेरे ..मेरी जान है तू,देश मेरे... देश मेरे.. मेरी शान है तू।"
आज का दिन, मेरा जन्म दिन। आज बुद्ध पूर्णीमा भी है। पिछले साल सोचा था और जो किया था उसी पथ पर आज चलना था।
मैं, एक आम आदमी सेना के लिए क्या करता? हर बार सेना के सम्मान में सोशियल मिडिया में पोस्ट लिखता, विडीयो और फोटो शेरा करतां या तो अपने आसपास वालो के साथ चर्चा करता । उसके आगे क्या?

पर उसके आगे जो कर सकता था उसका उत्तर मिला पिछले जन्मदिन पर। वो पिछले साल भी किया और इस साल भी किया...भगवान की मेहरबानी रही तो आनेवाले सालो में भी करता रहूंगा।

ये जो मैं लिख रहा हूं वो अपनी प्रशंसा करने के लिए नहीं पर इस लिए की कुछ लोग इस मुहीम के साथ जुड जाए तो मेरा ये लिखना सार्थक होगा। 

मैंने पिछ्ले साल भी भारत के वीर वेबसाईट पर जाके शहिदो के लिए कुछ अर्पण किया।
https://bharatkeveer.gov.in/
आप सभी सहयोग देंगे तो अपने शहिद वीर जवानो की आत्मा परम पिता से कहेगी 

"देश मेरे.. देश मेरे.. मेरी जान है तू,देश मेरे.. देश मेरे.. मेरी शान है तू।"

जय हिंद..जय हिंद कि सेना।

~ गोपाल खेताणी

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद   का जन्म  1 जुलाई , 1933 को   यूपी के गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में   हुआ था।   उनके पिता मोहम्मद उस्मान सिलाई का काम करते थे...