Saturday, 16 November 2019

इंजीनियरींग, टेक्नीकल नॉलेज और जोब!


आज का युग चेलेन्जींग है। हर रोज कुछ न कुछ इनोवेशन हो रहा है। कल के बच्चे जो चंदामामा को देख रहे थे वे आज उनेके चेहरे के पीछे क्या है (डार्क साइड ओफ ध मून!) वो देखने लेन्डर को उनके पास भेज रहे है। कहने का मतलब ये है की हर जगह कुछ न कुछ नई संभावनाऍ देखी जा रही है।

पर पढाइ में कुछ नया पन आ रहा है? मैं कुछ पोइन्टस आप के सामने पेश करुंगा पर इससे पहले कुछ युवा इंजीनियर्स जो अभी अभी एम्पलोइ (फ़्रेशर्स) बने हैं उनके अनुभव पढते हैं।


मम्मी जल्दी खाना दो मेरी पहली क्लास केमिस्ट्री की है, अगर लेट हो गयी तो सर क्लास में आने नहीं देंगे! तभी मम्मी की आवाज़ आई, जल्दी उठ जा आज ऑफिस नहीं जाना क्या! और ये लो केमिस्ट्री की क्लास छूट गयी! एक और कॉलेज का सपना टूट गया! जब से कॉलेज ख़त्म हुआ है तब से मेरी सुबह कुछ ऐसे ही होती है। वैसे तो ऑफिस में सभी लोग बहुत अच्छे हैं पर कॉलेज की भी अपनी ही बात थी। अगर काम की बात की जाए तो यहाँ आने के बाद पता चला कि हम जो कुछ भी कॉलेज में पढ़ कर आए थे ज़माना उससे कई गुना आगे निकल चुका है। मोबाइल फोन इंटरनेट कंप्यूटर आदि के बाद भी हमें वो ज्ञान नहीं मिला जो कि हमारे जीवन को एक नए वातावरण में ढालने के लिए आवश्यक था। कई बच्चों को नौकरियाँ नहीं मिलीं, अच्छे अंक लाने के बाद भी। वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे बच्चे भी थे जिन्हें इंजीनियर नहीं बनना था परंतु माता पिता की खुशी या दबाव के कारण इस क्षेत्र में आना पड़ा। उनका भविष्य क्या होगा पता नहीं। कहीं ना कहीं हमें ज़रूरत है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उचित रूप से सुधार करें। यदि हमें कॉलेज में ही उन सोफ्टवेयरस की शिक्षा दी जाती जो कि हमारी इंजीनियरिंग ब्रांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जैसे कि ऑटो कैड,स्काडा,पी.एल.सी, माइक्रो स्टेशन आदि, तो नौकरियाँ पाना तथा नौकरी करना दोनों ही काम हमारे लिए सरल हो जाते। ऐसी महत्वपूर्ण चीज़ों को सीखने के लिए हमें अलग अलग कोचिंग क्लास में जाकर भारी फ़ीस व समय दोनों लगाने पड़ते हैं जबकि यही चीज़ें हम कॉलेज में ही सीख सकते थे। इसलिए केवल उतना ज्ञान ही काफी नहीं है जो कि हमने किताबों में लिख दिया और बच्चों को उसे याद करने के लिए स्कूल कॉलेज में भेज दिया, बल्कि समय के अनुसार उसे बदलना और सुधारना भी अति आवश्यक है। तथा हर कोई बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता, हर बच्चे में एक अलग गुण होता है, बस ज़रूरत है तो उसे समझने और निखारने की। भविष्य किसी ने नहीं देखा परंतु एक अच्छे भविष्य की कल्पना एक व्यवस्थित वर्तमान से ही शुरू होती है।
~ लोमशा

आज की दुनिया में एक सफल इंसान वही है जो अपने व्यवसाय और निजी जीवन में संतुलन बनाकर रखे। परंतु ऐसा कम लोग ही कर पाते हैं। लोग अपने व्यवसायिक जीवन में इतना खो जाते हैं कि परिवार को समय नहीं दे पाते। इसका एक कारण ये है कि जब वे कालेज में होते हैं तो उन्हें आने वाले समय से उतना परिचित नहीं कराया जाता जितना होना चाहिए। केवल किताबी ज्ञान उन्हें वास्तविक स्थिति के लिए तैयार नहीं कर पाता।

आजकल की शिक्षा प्रणाली में  परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। बच्चों को प्रैक्टिकल ज्ञान देने में बढ़ोतरी की काफी जरूरत है। किताबी ज्ञान केवल हमें विषय से रूबरू कराता है परंतु असल में हो क्या रहा है और कैसे हो रहा है ये उस कार्य को करने से ही पता चलता है। इसलिए कालेज में समय-समय पर वर्कशॉप आयोजित होते रहने चाहिए। व्यवसाय में जाकर एक इन्सान को किन परिस्थितियों का सामना करना होगा इसकी तैयारी कालेज में ही हो जानी चाहिए।
~नीरज सिंह

जब हम कॉलेज में होते हैं तो सिर्फ हमें यही सोचना होता है कि बस हमारे मार्क्स अच्छे आ जाएं और किसी अच्छी कंपनी में जॉब मिल जाए तथा जल्दी-जल्दी हमारी सैलरी भी बढ़ती रहें और हमारी पोस्ट भी। पर हम कभी यह नहीं सोच पाते कि जब हम कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाएंगे तो हमें किन किन बदलावों का परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और ना ही हमारा कॉलेज हमें कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाने के लिए तैयार करता है।
हम जब कॉलेज में होते हैं तो अगर हमें कोई विषय समझ नहीं आता तो हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह अपने शिक्षकों से विषय जाकर समझ लेते हैं पर इसके विपरीत जब हम जॉब में होते हैं और हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम यहां एक अच्छे कार्यकर्ता के रूप में बहुत से जाकर नहीं समझ सकते क्योंकि यहां यह साबित होगा कि हम उस कंपनी के ही लायक नहीं है। जब हम कॉलेज में होते हैं तब हम दोस्तों के साथ शिक्षकों के साथ बेझिझक अच्छे से वह सामान्य बर्ताव करते हैं इसके विपरीत जब हम जॉब लाइफ में आते हैं तो हमारे साथ काम करने वाले सहकर्मी और ज्यादातर ऐसे सहकर्मी जो वरिष्ठ होते हैं तो हमारा उनसे सामान्य बर्ताव नहीं हो पाता है। शुरुआत में तो काफी ज्यादा झिझक रहती है क्योंकि शुरुआत में हम लोग नए कार्यकर्ता होते हैं उनके यहां तो वह लोग हमारा काफी ज्यादा निरीक्षण करते हैं इसलिए हमें जरूरत है कि हम बच्चों को कॉलेज से ही जॉब लाइफ के लिए तैयारी करवाएं ताकि उन्हें कॉलेज से जॉब में जाने के बाद ऐसी परेशानियों का सामना ना करना पड़े।
~शालिनी मिश्रा


तो देखा आपने की युवा इंजीनियरों की कुछ समस्याए है। क्या कीया जाए उससे पहले मैं अपना अनुभव कहना चाहुंगा।

१९९९ में डीप्लोमा फेब्रीकेशन टेक्नोलोजीमें दाखिला लिया तब उस प्रोग्राम को पूरा रिडिफाइन किया था। (HOD जी.डी.आचार्य एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत की थी) इस डीप्लोमा की खास बात थी की लास्ट सेमेस्टर से पहले बच्चों को ६ - ६ महीने की (पूरा १ साल) दो कंपनी में ट्रेनींग होती थी। तो इस लिए व्यवसायिक जिवन में प्रवेश करने  से पहले हम पूरे तैयार हो जाते थे। मुजे तब भी ये लगा की कोलेज के पास इतने सारे मेन्युफेक्चरींग ड्रोइंग्स थे की वो कैसे पढे जाते हैं उनकी शिक्षा देते तो उन्हें कैसे तैयार करे जाते वो हम आसानी से समज पाते।

ठीक वैसा ही मैने डीग्री प्रोडक्शन इंजीनियरींग करते वक्त भी पाया। (HOD मंगल भट्ट एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत कर नया करीक्युलम बनाया) यहां भी हमे ३ महीने की ट्रेनिंग लेनी थी जो कारगर साबीत हुइ। पर बात वहीं पे अटकी। जो चल रहा है इंडस्ट्री में वो तो हमें पता ही नहीं।

अब आते हैं सोल्युशन पर। तो सोल्युशन ये है की या तो कॉलेज अपने करीक्युलम में लगातार इम्प्रुवमेन्ट लाये (प्रेक्टीकल तौर पे) या फिर इंजीनियरिंग कम्प्लीट करने से पहले स्टुडन्ट को बाहर से ये ज्ञान लेना है ।

१ - सोफ्टवेर / हार्डवेर साइड डेवेलोप हो। कम्प्युटर का भी एड्वान्स लेवल नॉलेज होना बहुत ही जरूरी है। हर स्ट्रीम के जरूरी सोफ्टवेर के लेटेस्ट वर्जन का अनुभव छात्रों को मिले। 
२ - एक फूट में कितने मिलि मीटर, सेन्टी ंमीटर और इंच होते है ये अगर फाइनल यर स्टुडन्ट को मालुम  नहीं तो फिर उसे शिकायत करने का हक्क नहीं की उसे नौकरी नहीं मिल रही। ये सिर्फ एक उदाहरण है। बेझीक नॉलेज होना बहुत ही आवश्यक है जो मुझे लगता है बहुत ही कम छात्रों के पास है (शायद वो ही गंभीर है और उतने हीं चूने जाते हैं)।
३ - कॉलेज के बाहर ही रिआलीटी है वो समजने की और समजाने की जरूरत है। रंग दे बसंती का डीजे (आमिर खान) याद है न? "गुल्ल्बो..कॉलेज के गेट के इस तरफ हम जिंदगी को नचाते है.. डीम लक लक दे डीम लक लक.. और गेट के उस तरफ जिंदगी हम को नचाती है.. डीम लक लक दे डीम लक लक...।" 
४ - कोन्फीडन्ट होना अच्छी बात है पर ओवर कोन्फीडन्स और एटीट्युड आप को जोखीम में डाल सकते है! और इस में झहर घोल सकता है आपका प्रोपर कम्युनिकेशन का अभाव। अगर आप अच्छे से अपने आप को, अपनी नॉलेज को एक्स्प्रेस नहीं कर पाते तो सिलेक्शन होना या फिर प्रमोट होना मुश्किल है।
५ - सेलरी से ज्यादा ध्यान काम पर और अपने चोइस की फिल्ड पर दे। मुजे मेन्युफेक्चरींग पसंद है पर डीझाइन (इपीसी) आज कल ज्यादा सेलरी दे रही है तो मैं उसमे चला जाता / चली जाती हूं - ये सोच लंबे केरीयर ग्राफ के लिए उचित नहीं है। शुरु के दो साल सिर्फ आप सिखने में बिताए; ना की सेलरी गिनने में। बाबा रणछोड दास चांचड उर्फ रेन्चोने कहा था की "दोस्त, एक्सलंस के पीछे भागो, सक्सेस जख मार के पीछे आएगी!"

अब विश्राम... कुछ और पोइंट्स बाद में। अगर कोइ कॉलेज के प्रोफेसर्स इस आर्टीकल को पढ रहे है तो गुजारीश है की छात्रों को प्रेक्टीकल ज्ञान बांटीए, ज्यादा से ज्यादा वर्कशोप्स और छोटी ही सही पर ट्रेनींग करवाइए।

और फाइनल और प्रिफाइनल यर्स स्टुडंट्स एवम न्यु जोइनीझ, आप बेझीक्स पर ध्यान दिजीए। कुछ पैसे नये कोर्सीस सिखने में भी लगाइए, ये भी आप का एक इन्वेस्टमेंट है। (खुद का एक्सपिरीयंस है!)

ओल ध बेस्ट ! और हां "आल इज वेल" :)  हंमेशा याद रखीएगा!!!

~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 22 October 2019

दिवाली – कल आज और कल !


"दिवाली" – ये शब्द कानो में गूंजते ही रंगबिरंगी आभा सब के मनोपटल पर छा जाती है। यह कल्पना अमीर -गरीब, बच्चे – बुढ्ढे – जवान  के बीच अंतर नहीं देखती!

और यही खुशी आप उपर वाली फोटो में देख सकते हो! एस्टर पब्लीक स्कूल में केजी के बच्चोने सब के साथ दिवाली मनाइ! अपने पारंपरीक वस्त्रो में सज धज कर आये बच्चो को टिचरने रंगोली, दिए का महत्व बताया और दिवाली के त्योहार का उत्साह इन नन्हे मुन्ने बालको के मन मंदीर में जिवीत कीया!
(फोटो कर्टसी - एस्टर पब्लीक स्कुल, मयुर विहार, दिल्ही। साभार - दिव्या मेडम) 
अभी तो दिवाली यानी ओनलाइन सेल से खचाखच भरा हुआ बाझार। (ओफलाईन बाजार में भले ही मंदी हो, ओनलाईन अरबो रूपये  कमा लेता है!) अभी तो दिवाली यानी शोपींग मॉलमें लुत्फ उठाने का त्योहार!
दिवाली का मतलब छुट्टियां है तो घर पर ताला लगाने का मौका! (और तस्करशास्त्रीयों का भी!)  हम घर पर हो तो मेहमान आएंगे न? कौन घर पर पकवान बनाएं, मिठाइयां बनाएं, गुजीया बनाएं, घर सजाएं?? छुट्टीयां मिली है तो घूम लेते है कहीं!
ऊपर वर्णित "दिवाली"    सर्व व्यापक नहीं हैलेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार हो रहा है।
क्या मेरी बातें  निराशाजनक लगती हैंचलो कुछ अच्छी बातें करते है। आपको अतीत में डुबकी लगाने ले चलता हूं।
बात शरु करने से पहले बता दुं की गुजराती नव वर्ष दिवाली के दूसरे दीन से शुरु होता है। हम गुजरातीयों के लिए (सब की तरह) दिवाली बहुत मायने रखती है! अब आता हुं मुद्दे पर;
स्थलः 'अनुपम वस्तु भंडार', गुंदावाडीराजकोट, गुजरात। समयखंड 1995-2005
वैसे तो पापा की यह दुकान सिर्फ बुक – स्टेशनरी की है पर पटाखे बेचने का स्थायी लाइसन्स होने पर हम पटाखे बेचते थे। दुकान मेइन मार्केट रोड से थोडी दूर अंदरवाली गली में है। पापा को आसपास में रहते सभी बच्चे “अनुपम” नाम से बुलाते थे क्युंकी उन्हें लगता था की दुकान का नाम मेरे पापा के नाम पर से ही होगा। आज वो बच्चे ३५-४० साल के आसपास होंगे। खैर दिवाली के पांच  - छह दिन पहले  हम पटाखो की बिक्री शरु कर देते थे। जैसा मैने पहले बताया की गुजरातीयों का नववर्ष होता है तो स्कुल में दिवाली की २० दिन की छुट्टी मिलती थी। मैं तब १२ – १३ साल का था और खुशी खुशी पटाखे बेचने दुकान पर जाता था। (लोहाणा के खुन में ही बिझनेस होता है!) 
कई बच्चे दुकान के पास बहुत चक्कर लगाते और पटाखो के रंगीन पोस्टर देख अपनी कल्पना के रंग उसमें भरते। ये बच्चे हमारी बुक – स्टेशनरी के विश्वासु एवम रोजाना कस्टमर थे। (पेन्सील – इरेझर वाले!)
पटाखो के पेकेट मे से कई बार फुलजडी निकल पडती या अनार, जमीन चक्कर पर से रंगीन कागझ निकल जाते। उन पटाखों को पापा एक अलग बक्से में रख देते। मुजे याद है की एक बार एक छोटु पांच का सिक्का ले के दुकान पे आया। पांच का सिक्का मेरे पापा को देकर एक्दम खुशी खुशी तोतलाते हुए बोला, “ अनुपम, पांत ना फटाकीया” – मतलब पांच के पटाखे। और उस के बाद अपनी दोनो कोन्ही टेबल पर टीका उसपे अपना मुंह फिक्स कर सभी पटाखों को आराम से देख रहा था। पापा ने वो जो अलग बक्से में पटाखे रखे थे उसमे से कुछ् पटाखे निकाल उसको दिए। वो पटाखों की किंमत सन २००० के हिसाब से १५ – २० रुपये होगी। मैने फिर पापा की और देखा। वो बोले उसके पापा बगल वाली साबुन की फेकट्री में मझदूर है। इस छोटु को भी तो दिवाली मनानी होगी ना? हां पैसे इस लिए मैने लिये ताकी उसे ये विश्वास रहे की पटाखे मुफ्त में नहीं मिलते। पापा दुकान पे आते भिखारी को भी ऐसे ही उस बक्से में से कुछ दे देते थे। भिखारी के बच्चों की मुस्कान देखने लायक बनती। यहां पर मैं अपने पापा की वाहवाही नहीं कर रहा  और ना ही भिखारीओ को उत्तेजन देने की बात कर रहा हूं। मैं बस इतना कहना चाहता हूं की हम कुछ ऐसा कर पाए की और लोग भी हमारे साथ त्योहार मना पाए।
आज अगर सो रुपये लेकर बाझार में जाकर पटाखे मांगो तो व्यापारी हस देगा। पर तब ऐसा नहीं था। उस समय हम बीस – तीस रुपये के पटाखे भी बोक्स में से निकाल कर दे देते थे। मुख्य उद्देश्य व्यापार करने के साथ मस्ती भुनने का भी था। और ये सीर्फ हम नहीं सभी व्यापारी ऐसा करते थे।
उस समय सब को अपने बजट के अनुसार त्योहार मनाना आता था। उस समय औरते पुराने कपडों के बदले नये बर्तन ख्ररीदती थी। इस ‘एक्स्चेंज’ ओफर का अपने पडोशीयों के साथ ‘ग्रुप डिस्कशन’ करती थी। सडकों के किनारे बैठे हुए रंगोली , दीए वाले के पास से खरीददारी होती थी। लाइटों की चमचमाती रोशनी देखने लोग बाझारों में घूमने निकलते थे। रेडी एवम दुकानो से जूते , चप्पल, कपडें, साज सजावट के सामान खरीदे जाते। दिवाले के दिन अशोक व्रुक्ष (आसोपालव) के पत्ते से बने तोरण (लडी) की खरीददारी होती है। दुसरे दीन नववर्ष पे सब बच्चे तैयार हो कर आस पडोश और सगे – संबंधीओ के घर पर जा के पैर छूते हैं और उनसे आशीर्वाद (लक्ष्मीजी भी! ) पाते। घर के सभी सदस्य मंदीर जा कर फीर एक दूसरे को बधाई देने पहुंचते।
पहले मिट्टी के दिए बेचती बुढ्ढी अम्मा से लेकर सबरस (नमक) बेचते हुए चाचा तक सब दिवाली मनाते थे। उस समय लारी – रेडी में से खरीदने में कोई असहज महसूस नहीं करता था। छोटी छोटी चिजो में कोई क्वालीटी का सवाल भी नहीं होता था।
मगर आज हम क्या कर रहे है? हम किसी के त्योहार की खुशीया छीन तो नहीं रहे ना? ओनलाइन शोपींग और मॉल के चक्कर में कइ लोगों के दिये नहीं जल पाते।
चलो इस दिवाली पे हम औरो की खुशी में भी शामिल होते है। इस दिवाली सब को साथ लेकर चलते है। बच्चे – बुढ्ढे कीसी के दिल को चोट ना लगे ये संकल्प लेते है।
आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाऍ सुरक्षीत रहें , स्वस्थ रहें!
-    गोपाल खेताणी

Sunday, 13 October 2019

D से डिसीप्लीन


“परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन – ये गुरुकुल के तिन आधार स्तंभ है” एसा हमने कुछ महानायक से महोब्बते मुवि में सुना था।
सहि मायनो में हमे अनुशासन यानी डिसीप्लीन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। ऐसा सुना है की सरदार पटेलने आझादी के तुरंत बाद कहा था की कुछ समय तक देशमें सरमुखत्यार शाही शासन होन चाहीये क्युंकी देश की जनता अभी अनुशासीता नहीं है। और ये बात अभी सच भी लग रही है।
नियमो की न परवाह है हमें और न ही कानुन के उल्लंघन का खौफ!
तीन तरह के लोग अनुशासीत नहीं है।
१ – पैसा और पावर है
२ – निम्न स्तरीय, जो शोर्ट कट के आदी है
३ – जो अनुशासन से अंजान है
समस्या
-    सब अपने देश की तूलना विकसीत देश से करते है, पर हम अपनी तुलना वहां की प्रजा से क्युं नहीं करते?
-    ट्रेन और बस में सफर किया होगा तो पता चल जाता है की कुछ लोगों की जागिर बनी क्युं नहीं? क्युंकी ये देश की जागिर का भी इतना बुरा हाल करते हैं कि अपनी जागिर का तो क्या हि किया होगा ये पता चल जाता है।
-    ट्राफिक के नये नियम से परेशान हो गई जनता को ये नहीं मालूम की फूटपाथ पर वाहन नहीं चलाए जाते। वाहन चलाते समय गुट्खा नहीं थुकते, मोबाइल पे बात नहीं करते, इन्डीकेटर देना आवश्यक है, दारु पी के नहीं चलाना।
-    जहां जहां भंडारा, पूजा या उत्सव होता है वहाम भिड जैसे बेकाबु हो जाती है। हर कोई अपना सोच दूसरो से आगे निकलने में लग जाता है।
-    कुछ लोग अच्छा अंग्रेजी जाड लेते है तो उन्हें लगता है कि हम नियम तोड सकते है।
-    कुछ लोग जो गरीब है तो उन्हें लगता है की उन्हें नियम से छूट मिलनी चाहीए।
-    कुछ लोग जिन्हें नियम मालुम हि नहीं उन्हे लगता है कि नियम न जानने की वजह से उन्हें तो सजा मिलनी ही नहीं चाहीए।
वाह रे देश…वाह रे मेरे भारतवासी!
उपायः
कुछ देशो की तरह हमारे यहां भी मिलिट्री ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहीए। बच्चों को शिक्षा में अनुशासन – डिसिप्लिन का एक विशेष विषय होना चाहिए। तहजीब हमें घर से सिखानी होगी। पैसा और पावर का दुरुपयोग अंत मे दुःखद हि होगा ये समजना चाहीए। समाज के निचले वर्ग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अगर उन्हें अनुशासीत कीया गया तो उनका विकास अपने आप होगा।

अंत में कुछ सवाल
-    क्या गलीयों और रोड पे अपनी गाडीयां पार्क करना जायझ है?
-    सडक के किनारे लारी – रेडीं खडी कर देना जायझ है?
-    जहां जगह देखी वहां झुग्गी – झोंपडी बसा देना जायझ है?
-    कहीं पर भी थूंकना, कचरा डालना, शौच करना जायझ है?
-    आप के पास मर्सीडीझ है इस लिए साईड न देना जायझ है?
-    ट्राफीक जाम में राइटसाइड से ओवरटेक करते हुए और ट्राफीक बढाना जायझ है?
-    एम्ब्युलन्स कहीं और से निकल जायेगी, मुझे क्या? ये सोचते हुए जगह न देना जायझ है?
याद रखीए D se Discipline की हम सबको आवश्यकता है।
- गोपाल खेताणी

Tuesday, 1 October 2019

नवरात्रि – शक्ति स्वरुपा की आराधना का त्योहार



सब से लंबे चलने वाले इस भारतीय त्योहार की खास बात ये है की ये कोई एक विशिष्ट प्रांत का त्योहार ना रहकर पूरे देशमें मनाय जाता है। हां, ये जरूर है की त्योहार मनाने की रीत-रस्म अलग है पर मक्सद एक है और वो है, शकित स्वरूपा की आराधना कर उसके आशिर्वाद ग्रहण करना।
पौष, चैत्र, अषाढ और अश्विन – ये चार नवरात्रों में से अश्विन नवरात्रि बडी धूमधाम से मनायी जाती है!
बंगाल की कालीपूजा से लेकर गुजरात के गरबा एवं दांडीया, उत्‌तर भारत की दुर्गा पूजा से लेकर दक्षीण में लक्ष्मी पूजा तक, नवरात्रोमें नौ देवीयों के आशिर्वाद लिए जाते हैं।
ये नौ देवियाँ  इस प्रकार है :-
·         शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
·         ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
·         चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
·         कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
·         स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
·         कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
·         कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
·         महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
·         सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।

गुजरात में नवरात्रि का विशिष्ट महत्व है।
नवरात्रों के दौरान गुजरात के घरोमें एवं मंदीरोमें घट स्थापन होता है! मिट्टी का छेद वाला कलश जीसे ‘गरबा’ बोलते हैं उसे स्थापित कीया जाता है। नौ दिन नौ रात तक उसमें ज्योत जगाइ जाती है और दशवे दिन ‘गरबा’ का विसर्जन होता है!
गरबा ब्रह्मांड का प्रतिक माना जाता है। गरबे में २७ छेद होते है। ९ छेद वाली तीन रेखाएं यानी २७ छेद. २७ छेद यानी २७ नक्षत्र. २७ नक्षत्र के चार चरण होते है। २७ X ४ = १०८। १०८ संपूर्ण अंक है जो ब्रह्मांड का अंक माना जाता है। नवरात्रि के ये नौ दिन गरबा की प्रदक्षिणा करते है उन्हें ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा करने का पुण्य मिलता है ऐसा माना जाता है। पर गरबा के आसपास ये खास न्रुत्य क्युं करते है?
मां दुर्गाने नौ दिन नौ रात तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवे दिन उसका वध किया। इसी कारण नौ रात तक मातारानी के भक्ति गीत गाये जाते है, और “गरबा” के आस पास एक अलग अलग प्रकार के ‘रास’ (न्रुत्य) होते है जो अब “गरबा” के नाम से मशहूर है। उसे आधुनीकीकरण में प्रस्तुत कर डांडीया कर दीया है मगर वो गरबा नहीं होकर सिर्फ व्यक्तीगत मनोरंजन है। पूरी दुनिया में गुजरात के डांडीया मशहूर है, मगर वो डांडीया और मां की आराधना का कोई लेना देना नहीं है।


जैसे आगे बताया की नवरात्रिमें मां की अर्चना के लिए जो ‘रास’ किए जाते हैं वे छोटी बच्चीयां एवं कन्याओ के द्वारा होते है और उन्हें ‘रास – गरबा’ का अभ्यास करवाया जाता है। उनको उस नौ दिन देवीमां का स्वरुप माना जाता है। नौ दिन तक उन्हे उपहार दिये जाते हैं। इस उपहार को “ल्हाणी” कहते है। “ल्हाणी” देने वाले खुद को धन्य समजते है। ये कन्याएं जो मां का स्वरुप है वो अदभुत गरबा रास प्रस्तुत करती है। गरबा रास को ‘गरबी’ के नाम से भी जाना जाता है। लडकों को भी कुछ विशिष्ट प्रकार के रास के लिए अभ्यास करवाया जाता है जैसे की तलवार रास, मशाल रास। सोशियल मिडियामें आप मशाल रास, तलवार रास, डाकला, दिया रास खोजकर देख सकते हैं। ये प्राचीन कला अब भी मातारानी के भक्तो की आस्था से गुजरात के पश्चीमी प्रांत; सौराष्ट्र और कच्छ में जीवंत है। अगर नवरात्रि के दिनो में गुजरात जाइए तो ये गरबा जरूर देखीएगा।
 जय माता दी।
~
गोपाल खेताणी

Tuesday, 13 August 2019

ए वतन वतन मेरे आबाद रहे तु!


(Photo Courtesy - Aster Public School, Mayur Vihar Ph 1, Delhi - on the eve of 15th August, Class - KG D - Thank you Divya Ma'm)

स्वातंत्र्य दिवस - १५ अगस्त... देश एक जझ्बे के साथ इस दिन सांस लेता है। और इस साल तो क्या कहने...रक्षाबंधन और स्वातंत्र्य दिन ..दोनो एक साथ।

रक्षाबंधन तो बच्चे बुढे सब मनायेंगे... त्योहार कि तो भारतीय जन जिवन में विशेष भूमिका रही है... पर स्वातंत्र्य दिन??
बच्चों के सिवा वो जोश और जूनुन शायद बहुत कम लोगो में नजर आता है।
शायद इस लिए भी क्युंकी हम आज ऐसे देश में रह रहे हैं जहां हर किसी को कुछ भी करने की, कुछ भी बोलने की आजादी है.. पर भारतिय संविधान के अनुसार एवम् कायदे में रहकर।

है कुछ जगह, कुछ गांव, कुछ समाज जहां ये आजादी नहीं... आज भी। पर मेरा देश बदल रहा है...लोग अब जाग्रुक हो रहे है.. तो वहां की भी तसवीर बदलेगी..वहां भी नया सवेरा होगा।

पर बात ये है की स्वातंत्र्य दिन पर देश भक्ति के मेसेज भेजकर, गाने बजाकर. देश भक्ति वाली मूवी देखकर, स्वातंत्रय दिन वाली सेल में खरिदारी कर.. एक छूट्टी हम परिवार या दोस्तो के साथे हशी खुशी मना लेते हैं.. सही है ना?

पर क्या कुछ अलग नहीं कर सकते? पराधीनता से स्वतंत्र होकर हम एक विकसीत राष्ट्र बनने की और चल  पडे है तो कुछ योगदान नहीं कर सकते?

क्या कर सकते है हम?
हम
- किसी गरीब बच्चे की फिस भर सकते है।
- निचले वर्ग के लोगों को प्रोत्साहीत करें की वो अपने बच्चों को पढाये।
- व्यसन मुक्ति का प्रण ले और दूसरों को भी व्यसन मुक्त कराये।
- दारु, ड्र्ग्स और स्मोकिंग़ से  स्वेग नही आता... व्यायाम, अच्छे खान पान और सच्ची सोच रखने से स्वेग बनता है बोस।
- महिलाओं का सम्मान घर के अंदर भी और घर के बाहर भी।
- कोई नहीं देख रहा हो तब भी कायदे का पालन करे वो इमानदार है।
- बच्चो के हाथ में अपनी संस्क्रुती की धरोहर सौपनी है, तो खुद भी अपनी संस्क्रुती को पहचाने, जाने और बच्चों को भी बताएं।
- जल ही जिवन है।
- व्रुक्ष है तो हम है।
- और आखीर में.. अहंकार त्यागे..क्युंकी
समय समय बलवान है, नहीं धनुष बलवान;
काबे अर्जुन लुटियो, वही धनुष वही बाण।

आभार...

तू ही मेरी मंजिल है, पहचान तुझी से;
पहुंचू मैं जहां भी मेरी बुनियाद रहे तू ;
 ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू 
मैं जहाँ रहूँ जहाँ में याद रहे तू ऐ वतन.. मेरे वतन..।

---- गोपाल खेताणी



Saturday, 18 May 2019

देश मेरे.. देश मेरे... मेरी जान है तू !






"देश मेरे.. देश मेरे ..मेरी जान है तू,देश मेरे... देश मेरे.. मेरी शान है तू।"
आज का दिन, मेरा जन्म दिन। आज बुद्ध पूर्णीमा भी है। पिछले साल सोचा था और जो किया था उसी पथ पर आज चलना था।
मैं, एक आम आदमी सेना के लिए क्या करता? हर बार सेना के सम्मान में सोशियल मिडिया में पोस्ट लिखता, विडीयो और फोटो शेरा करतां या तो अपने आसपास वालो के साथ चर्चा करता । उसके आगे क्या?

पर उसके आगे जो कर सकता था उसका उत्तर मिला पिछले जन्मदिन पर। वो पिछले साल भी किया और इस साल भी किया...भगवान की मेहरबानी रही तो आनेवाले सालो में भी करता रहूंगा।

ये जो मैं लिख रहा हूं वो अपनी प्रशंसा करने के लिए नहीं पर इस लिए की कुछ लोग इस मुहीम के साथ जुड जाए तो मेरा ये लिखना सार्थक होगा। 

मैंने पिछ्ले साल भी भारत के वीर वेबसाईट पर जाके शहिदो के लिए कुछ अर्पण किया।
https://bharatkeveer.gov.in/
आप सभी सहयोग देंगे तो अपने शहिद वीर जवानो की आत्मा परम पिता से कहेगी 

"देश मेरे.. देश मेरे.. मेरी जान है तू,देश मेरे.. देश मेरे.. मेरी शान है तू।"

जय हिंद..जय हिंद कि सेना।

~ गोपाल खेताणी

Saturday, 9 February 2019

एक मंदीर जहां पर दान पेटी नहीं..पर है दोनो वक्त रोटी! - श्री जलाराम मंदिर, विरपुर।



जलाराम बापा का जन्म सन्‌ 1799 में गुजरात के राजकोट जिले के वीरपुर गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम प्रधान ठक्कर और माँ का नाम राजबाई था। बापा की माँ एक धार्मिक महिला थी, जो साधु-सन्तों की बहुत सेवा करती थी। उनकी सेवा से प्रसन्न होकर संत रघुवीर दास जी ने आशीर्वाद दिया कि उनका दुसरा प़ुत्र जलाराम ईश्वर तथा साधु-भक्ति और सेवा की मिसाल बनेगा।
16 साल की उम्र में श्री जलाराम का विवाह वीरबाई से हुआ। परन्तु वे वैवाहिक बन्धन से दूर होकर सेवा कार्यो में लगना चाहते थे। जब श्री जलाराम ने तीर्थयात्राओं पर निकलने का निश्चय किया तो पत्नी वीरबाई ने भी बापा के कार्यो में अनुसरण करने में विश्चय दिखाया। 18 साल की उम्र में जलाराम बापा ने फतेहपूर के संत श्री भोजलराम को अपना गुरू स्वीकार किया। गुरू ने गुरूमाला और श्री राम नाम का मंत्र लेकर उन्हें सेवा कार्य में आगे बढ़ने के लिये कहा, तब जलाराम बापा ने 'सदाव्रत' नाम की भोजनशाला बनायी जहाँ 24 घंटे साधु-सन्त तथा जरूरतमंद लोगों को भोजन कराया जाता था। इस जगह से कोई भी बिना भोजन किये नही जा पाता था।
माघ शुक्ल द्वितीया, विक्रम संवत १८७६ को श्री जलाराम बापाने सदाव्रत (भंडारा, लंगर) शुरु किया उसे इस साल १९९ साल पूरे हुए।
ये पढकर आप को गर्व एवम्‌ आश्चर्य होगा की आज से १९ साल पूर्व ०९-०२-२००० को संत शिरोमणी पूज्य श्री जलाराम बापा के पावन  धाम श्री जलाराम मंदिर, विरपुर में किसी भी प्रकार का दान, भेंट एवम्‌ सौगात लेना बंद हुआ था।
हां, आप ने सही पढा,  श्री जलाराम मंदिर, विरपुर में दान पेटी का अस्तित्व ही नहीं है और वहां पर दोनो समय भक्तों को "प्रसाद" (भोजन, लंगर, भंडारा)  उपलब्ध कराया जाता है। जहां आज के समय में कोइ भी धर्म के पूजा स्थल, आश्रम स्थलो पर दान, सोना, चांदी, हीरे स्विकार किए जाते हैं वहीं श्री जलाराम मंदिर, विरपुर ने एक नई मिशाल पेश की है। आप चाह कर भी कोई भेंट या पैसे का चढावा नहीं कर सकते।

कैसे जाएं ः १) बाय रोड - अहमदाबाद से राजकोट आप बाय रोड जा सकते हैं। राजकोट से जुनागढ (२४ घंटे राज्य बस परिवहन की बसें मिलेगी) जाती हुइ कोई भी बस विरपुर रुकेगी। विरपुर हालांकी बडा गांव है, पर बहुत अच्छे होटेल नहीं मिल पायेंगे। रहने के लिए आप राजकोट या जुनागढ रुक सकते हैं। राजकोट से विरपुर की दुरी ५८ कि.मी. है।
           २) बाय ट्रेईन - अहमदाबाद से जुनागढ (या सोमनाथ - वेरावल) की और जाती हुइ ट्रेईन में विरपुर स्टेशन चेक कर ले। कुछ गाडियां वहां रुकती हैं।

संत श्री जलाराम बापा के भक्तों ने देश - विदेश में उनके मंदीर बनवायें है और बापा से प्रेरित होकर, उनाके आशीर्वाद से वहां भंडारा का आयोजन भी करते हैं। भक्त सिर्फ एक ही धुनी में रत है.....

देने को टुकडो भलो, लेने को हरि नाम;
ताके पदवंदन करुं, जय जय जय जलाराम।

~ गोपाल खेताणी


Sunday, 3 February 2019

२६ जनवरी...बचपन की ख्वाहीश जो साकार हुई!


२६ जनवरी... एक ऐसा दिन जब मैं और मेरे दोस्त स्कूल के दिनो में ध्वजवंदन कर तुरंत घर पे आकर टीवी पर चीपक जाते थे....हां .. परेड देखने । आप सब को भी वो दिन याद आ रहे होंगे.. हैं ना?

स्कूलींग राजकोट (गुजरात) में हुइ। उस समय में सोचता था की दिल्ही वालों को कितना मजा आता होगा...परेड लाइव देखने का! बचपन से ख्वाहीश थी की काश एक बार  ये परेड लाइव देखने को मिले।
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दिल्ही आए चार साल हो गए लेकिन परेड देखने के संयोग बने नहीं! इस साल मौका मिला (पास मिल गया!) और हम लोग[ढाइ लोग - हम, हमारी वो जी, और हमारी छुटकी जी.. ः)] सुबह साढे छः बजे पहुंच गये दिल्ही हाइ कोर्ट तक, क्युंकी आगे कोइ भी वाहन को जाने नहीं दिया.. #SecurityReasons। 

भाई साहब (बहन जी भी!), सुबह सुबह इतने लोग साथ में चल रहे थे मानों सहीमे सब एक उत्सव मनाने जा रहे हो। बच्चे बुढ्ढे सब के चहेरे पे एक अजीब उत्साह छलक रहा था।

हर जगह तैनात पुलिस कर्मीयोंने रास्ता दिखाने एवम्‌ पास पे जिस गेट से प्रवेश करना था उसके लिए मदद की।
उन सभी कर्मचारीयों को सलाम। क्युंकी मेरे जैसे कई लोग उनको परेशान कर रहे थे मगर ये कर्मचारीयोंने  उत्साहीत हो के सब को सही माहिती प्रदान की।

नौं बजे से पहले पहले हम राजपथ पर; राष्ट्रपति भवन से इन्डिया गेट की और से देखें तो बांइ और शास्त्री भवन के पास बैठें। आगे से दसवीं पंक्ति में हमे कुर्सी मिल गई। 
अहा! वहां का जोश और जूनुन देख तन मन में राष्ट्रप्रेम का जझ्बा ओवरलोड हो गया..और क्युं ना हो!
बचपन की ख्वाहीश जो आज पूरी होने जा रही थी।

परेड शरु होने वाले थी, मैंने बगल में बैठे महोदय से हाय हैलो कीया। श्री हिरालालजी अपने परिवार के साथ आए हुए थे। उनके साथ  बातें कर मन प्रसन्न हो गया। उन्होंने काफी माहिती दी..वो पहले कई बार परेड देख  चूके थे।

हम बातें कर रहे थे और तभी महामहीम राष्ट्रपतिजी का आगमन हुआ। उनकी कार हमें दिखी, सब का अभिवादन वे हाथ हिलाकर कर रहे थे.. मन को कहीं बहुत अच्छा लग रहा था। थोडी देर में हैलिकोप्टर से फूल-पंखडीयों की वर्षा हम सब पर हुई। मेरी बेटी फूली न समाई। 

और फीर मार्च पास्ट, मिसाइल, टेन्क और सेना के अत्याधुनीक हथीयार एवम्  उपकरण (वज्र टेन्क देखकर बहुत उत्साहीत हुआ... मेरे L&T वाले दोस्त इस प्रोजेक्ट का हिस्सा रहे हैं।), राज्यों की अनुपम झांखीया, बिएसएफ के जवानों के मोटरसाइकल पर हैरतअंगेज करतब और अंत में वायुसेना का शानदार शो।

वाह, ये क्षण जिंदगी भर के लिए मन-मस्तिष्क में अंकित हो गए। 

आते और जाते समय, हमारा Josh High था।

बस, यही कहना चाहुंगा की अगर आप दिल्ही के निवासी है, या आसपास रह रहे हैं तो २६ जनवरी की परेड देखने जरूर जाइये। सच मानीये, परेड देख आप का दिल भी बोल उठेगा

हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा; 
यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहाँ से, 
अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा; 
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.. सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा । 

जय हिन्द...जय हिन्द की सेना।

~ गोपाल खेताणी


Wednesday, 23 January 2019

"शौर्यम..दक्षम..युध्धेय..! बलिदान परम धर्म !

फोटो -विकिपिडिया


ये नया हिंदुस्तान है...ये घर में घुसेगा भी और मारेगा भी।

कई लोग उडी फिल्म देख चुके होंगे..तो कई लोग इसके बारे में सुन चुके होंगे। मैं यहां मूवी का रिव्यु नहीं लिख रहा। पर मैं लिखना चाहता हुं उन अल्फाझों को जो दील पे दस्तक दे रहे हैं।

कुछ लोगों को (सेवाकर्मीओं को) हम ग्रान्टेड ले चूके हैं। जैसे की आर्मी, बीएसएफ, नेवी या एरफोर्स....ये तो उनका कर्तव्य है.. ये हमारे दिमागमें छप चूका है। पर सोचों की देश कि रक्षा करतें करतें ये अपनी जान  गवां देते है... आप और हम जो काम करते हैं तब इस तरह जान की बाझी लगाते हैं? वो भी दूसरों के लिए?

ये बातें बूरी लग रही हो तो चलो थोडा सा डाइवर्ट होते हैं। जवानों के प्रति सम्मान है तो कुछ ऐसा करें की उन्हें अपनी जान गवानी न पडे। 
१ - सक्षम सरकार चुने जो जवानों के लिए, देश के लिए सही निर्णय ले...(#उडी फिल्म)
२ - सतर्क रहें, चौकन्ने रहे। थोडे से पैसो के लिए इमान न गवाएं या "हमें क्या?" सोच कर गैर जिम्मेदारा बर्ताव ना करे। किरायेदार, पेइंग गेस्ट की छान बीन अच्छे से करें।(#NIA छापे)
३ - दंगा फसाद से दूर रहे, बहकावे में न आए। पब्लिक प्रोपर्टी को नुकसान पहुंचा कर आप स्वयं और देश का अहित कर रहे हैं। कोमी एक्ता बरकरार रखें। जात  - पात से उठकर देश हित में सोचे।

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अब ये कहना चाहुंगा की आप को सेना के प्रती सम्मान और गर्व है तो "उडी" देखीये..बच्चों को भी अवश्य दिखायें। सरकार और सेनाने मिल के जो कर  दिखाया है वो देख कर आप फक्र महसुस करेंगे।
सेना के इस बेहद खतरनाक मिशन को देखीए और समजीए। जो इस मिशन के प्रति संदेह व्यक्त कर रहे थे या सबूत मांग रहे थे उन लोगों को पहचाने।


अगर आप थोडे से भी संवेदनशील है और सेना के प्रती भाव है तो फिल्म में वोर क्राय के द्र्श्य को देख आप की आंखो में आंसु जरुर आयेंगे ये मेरा दावा है।

वोर क्राय : "शौर्यम..दक्षम..युध्धेय..! बलिदान परम धर्म !"


अब ये संदेश उन लोगों के नाम जो सेना के जवानों के लिए कुछ करना चाहते हैं। नीचे दी गई लिन्क पे जाकर आप विर शहिद जवानों के खाते में यथा शक्ति अनुदान राशी जमा करवाएं। देश को और सेना को आप पे गर्व होगा। ये अधीकृत साईट है...इस लिए निश्चिंत रहें। साइट पर जाने के बाद आप को इसके बारे में  अधिक जानकारी मिलेगी। एक बार इस साइट की मुलाकात अवश्य लें। ये साइट की जानकारी अपने मित्रों और रिश्तेदारों तक पहुंचाये।

https://bharatkeveer.gov.in/

जय हिन्द।

~ गोपाल खेताणी



परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद   का जन्म  1 जुलाई , 1933 को   यूपी के गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में   हुआ था।   उनके पिता मोहम्मद उस्मान सिलाई का काम करते थे...