Monday, 13 April 2020

मन में है विश्वास – शैलेष सगपरिया




मन में है विश्वास – शैलेष सगपरिया

नमस्कार मित्रों। आशा है आप सकुशल होंगे और लोकडाउन के नियमों का पालन कर रहें होंगे। लोकडाउन के इस समय में कई लोग, कइ संस्थाए बहुत अच्छे काम कर रही है। ऐसी ही दो एज्युकेशनल इंस्टीट्युट ने कल १२ अप्रेल को फेसबूक पे लाइव वक्तव्य का आयोजन कीया।

Genius English Medium School और Jay International School  राजकोट, गुजरात द्वारा आयोजीत इस वक्तव्य को बहुत ही अच्छा प्रतिसाद मिला। वक्ता थे, राजकोट और गुजरात के प्रसीद्ध वार्ताकार, वक्ता एवम सरकारी अफसर श्री शैलेष सगपरिया। चूंकी ये पूरा वक्तव्य गुजराती में था आप को इस वक्तव्य के चुनींदा अंश इस लेख में बताउंगा। 

उन्होंने ना सीर्फ कोरोना संकट में लोकडाउन के समय क्या करना चाहिये ये बताया पर उसके बाद भी क्या करना चाहिये ये भी बताया, जो हमारे सुखमय जिवन के लिए लाभदायी रहेगा।
लोकडाउन के इस समय में और कोरोना की महामारी से वो ही लोग शांतिपूर्वक जी रहे है जीनके पास पांच स्वास्थ्य है।

              १)        शारीरिक स्वास्थ्य

२)        मानसीक स्वास्थ्य
३)        आर्थीक स्वास्थ्य
४)        सामाजिक स्वास्थ्य
५)       आध्यात्मिक स्वास्थ्य


१)     शारीरिक स्वास्थ्यः
जिनका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा है उनकी रोगप्रतिकारक शक्ति भी अच्छी है। हमने देखा है की कइ व्रुध्ध व्यक्ति कोरोना का शिकार होने के बावजूद ठीक होकर घर को वापस लौट आए है, क्युंकी उनका शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा था| जो पहेले से ही Blood Pressure, diabetes, किडनी संक्रमण या अन्य बिमारी से ग्रस्त थे वो उबर नहीं पाये।
जिसको तंबाकु, दारु , सिगारेट, बीडी आदी का व्यसन हो इनके लिए लोकडाउन वरदान है की इस  समय वो अपना आत्मबल बढाए और व्यसनमुक्त हो जाए।
आप अपनी फिटनेस पर ध्यान दे और शरीर को चुस्त बनाए। व्यायाम, योग, डांस आदी तरीको से अपने आप को फिट रखे।
जितने दिन ये लोकडाउन चलेगा यकिन मानीए उतने दिन का आयुष्य आप का बढ गया है। क्युंकी इन दिनों आपने जंक फूड खाया नहीं। अपने घर का शुध्ध सात्विक भोजन और अपने मटके का पानी ग्रहण कीया।
अगर यही रीत आप जिवन भर अपनाएं तो आपकी रोग प्रतिकारक शक्ति बढेगी; इसमें कोइ दो राय नहीं।

२)   मानसीक स्वास्थ्यः
डोक्टर बर्नी सिगल जो एक केंसर विशेषज्ञ थे उन्होंने एक बेस्ट सेलींग किताब लिखी - लव, मेडीसीन एंड मिरेकल। उस किताब का एक किस्सा आपको बताउंगा। मि. राइट नाम के जनाब को तिसरे स्टेज का केंसर हुआ। उस समय केंसर की कोई भी दवाइ मौजुद नहीं थी। मि. राइट का उपचार डो. सिगल के अस्पताल में चल रहा था।  मि. राइटने सुना की एक कंपनीने केंसर की दवाइ बनाइ है पर अभी तक उसका टेस्ट या रिझल्ट पता नहीं चला। मि. राइटने डो. सिगल से जिद कर के वो दवाइ मंगवाइ और दवाइ खाना स्टार्ट किया। दो महिनो में मि. राइट केंसर से मुक्त हो गये और स्वस्थ जिवन जिने लगे। एक साल बाद उस दवाइ के बारे में चारो और न्युझ फैली के दवाइ केंसर को ठिक करने में निषफ़ल है, वो कुछ भी नहीं कर सकती। मि. राइट को ये न्यूझ मिली और एक महिने में फिर से वो केंसर ग्रस्त हुए । इस बार डोक्टर उन्हें बचा नहीं पाए।

ये किस्सा हमारे मानसीक स्वास्थ्य से जुडा है। अगर हम हकारात्मक अभीगम नहीं रखते तो उसका असर हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर होता है। जिसका मन स्वस्थ उसका तन स्वस्थ। पूरा दिन हम कोरोना के न्यूझ सुनते रहेंगे तो दिमाग खराब ही होगा। कीसी और जगह पे ध्यान केंद्रीत नहीं होगा। खाने पिने का मन नहीं होगा। स्वभाव चिडचिडा हो जाएगा। 
इस लिए इस समय हम अपना ध्यान अच्छी किताबे पढने, अच्छे कार्यक्रम (रामायण, महाभारत आदी) देखने में, कुछ नया सिखने में, बच्चों एवम परिवार के साथे कुछ इनडोर गेम्स खेलने में व्यतित करे तो हमारे मन को आनंद मिलेगा और हमारा मानसीक स्वास्थ्य बेहतर होगा।

गुजरातीमें मुहूर्त को चोघडीया कहते है। सात मूहुर्त  (चोघडीया) होते है।
लाभ, शुभ, अम्रुत – अच्छे मूहुर्त
चल – तट्स्थ मूहुर्त
उद्वेग, रोग, काल – खराव मुहूर्त

चल याने हम। हम सकारात्मक सोचेंग़े, सकारात्म्क कार्य करेंगे तो हमें लाभ होगा। हमे शुभ अवसर प्रदान होंगे। हमारा जिवन अम्रुतमय बनेगा।

हम नकारात्मक सोचेंगे, नकारात्मक कार्य करेंग़े तो मन में उद्वेग बढेगा। मन में उद्वेग बढेगा तो शरीर रोग ग्रस्त होगा और काल हमारे जिवन को नष्ट करेगा।

अपने मानसीक स्वास्थ्य पर ध्यान दे।

३)   आर्थीक स्वास्थ्यः
इस लोकडाइन के समय में सबसे कम खर्चा हम सबने किया होगा। हमने सिर्फ उन्हीं चिजों पे पैसे खर्च किए जो एक सादा जिवन जिने के लिए आवश्यक है।
पर कइ लोगों को इस समय पैसों की चिंता हो रही होगी जो स्वाभाविक है। अगर आप के एकाउंट में, घर में नकदी नहीं है तो जाहिर सी बात है मुश्किल होगी ही।

पर ये स्थिति क्युं पैदा हुइ? हमारे बडे बुझुर्ग हंमेशा से बचत को महत्व देते थे। अगर हम तिन – चार महिने भी नहीं निकाल पा रहे है तो ये हमारे भविष्य के आयोजन पर सवालिया निशान है।
बचत का महत्व समजिए और अपने बच्चों को अभी से समजाएं।

(लोकडाउन टिप्सः गुजरात में आज भी कइ जगह पूरे साल के गेहुं, चावल, तेल, मसाले रखने की प्रथा है।)

४)   सामाजिक स्वास्थ्यः
सामाजिक स्वास्थ्य याने जिन के रिश्ते अपने घरमें, अपने आस पडोस में, मित्रों के साथ, सगे संबंधीओ के साथ, नोकरी या बिझनेस सर्कल में; मधुर है वो इस लोकडाउन पिरियड को एंजोय कर रहे है। फेसबूक चेलेंज दे रहे है,  पूरी कर रहे है। ओनलाइन मिटींग कर रहे है, गेम्स खेलते है, गाने गाते हैं, लिखते है, सुनते है और खुश रहते है।
जिन्होंने अभी तक सिर्फ अपना समय खुद को ही दिया या फिर नोकरी, बिझनेस को ही दिया उनके लिए ये समय संकट भरा रहा होगा।
आप हमेशा अच्छे सकारात्मक लोगों के साथ रहीए, रिश्ते डेवेलोप करीए। कभी कभी संकट समय में हमारे आसपास के लोग ही हमें काम आएंगे।
एक अच्छा जोक है – हमारे पास ऐसे दोस्त होने चाहिए जिन को हम अपनी मुसीबते बता सके; जो मुसीबत को दूर तो नहीं कर पाएंगे पर ऐसे ऐसे सुझाव बताएंगे की आप को मुसीबत सुझाव से ज्यादा आसान लगेगी।

५)   आध्यात्मिक स्वास्थ्यः
जो लोग स्थितप्रग्य है, जिन्होंने ये स्विकार किया है की अभी चल रहा संकट अस्तित्व का आयोजन है वो अभी लोकडाउन में बेहतर तरीके से निर्वाह कर रहे है। स्रुष्टी के आयोजन का स्विकार करे। हां, ऐसा नहीं के बैठे बैठे सिर्फ देखते रहें, कर्म तो करना पडेगा मगर बावरे ना होकर प्रक्रिती के नियम को समजे। स्रुष्टी अभी नव पल्ल्वीत हो रही है। आप कइ विडीयो देख रहे होंगे की प्रक्रिती कैसे चहक रही है जब मानव घर में बंध है तो!
डो. कलामने अपने किताब में लिखा था की जब ७०० वर्ष पूर्व महामारी हुइ थी और लाखो लोग मारे गए थे उसके बाद स्रुष्टी नव पल्ल्वीत हुइ, और निखर के सामने आइ थी।
***
वाइरस एक परोपजीवी है। जो मानव शरीर में आश्रीत होता है फिर उसी मानव को मार देता है। मानव भी स्रुष्टी के लिए वाइरस है। वो स्रुष्टी का आश्रीत है और उसी को खत्म कर देता है। हम इस प्रक्रिती के साथ छेडछाड ना करे।

अब अंत में इजिप्त की लोककथा सुनते है।
कहा जाता है की मरने के बाद इंसान को परम पिता तिन सवाल पूछते है। अगर तिनो का उत्तर “हां” में मिला तो ही उसे स्वर्ग मिलता है अन्यथा उसे वापस प्रुथ्वी पर जन्म लेना पडता है। वो तिन सवाल है

१ – क्या तुमने जिवन का आनंद लिया?
२ – क्या तुमने अकेले हि जिवन का आनंद लिया या दूसरो को साथ भी अपना सुख साझा कीया?
३ – तुम सबने आनंद लिया इस में प्रक्रिती भी आनंदित थी ना? (मतलब और कोई दुखी नहीं हुए थे ना?)

आशा है आप को श्री शैलेष सगपरियाजी के वकत्वय के आधार पर लिखा हुआ मेरा लेख पसंद आया होगा। मैं श्री श्रीकांत तन्नाजी का आभारी हुं जिनकी वजह से में ये वकत्व्य लाइव देख पाया।

ये विडीयो अभी भी फेसबुक पे आप देख सकते है। जिन्हें गुजराती समज में आती है वे जरूर देखे। ये रही लिंक।


आप का आभारी
गोपाल खेताणी

Monday, 6 April 2020

लॉक डाउन और अवसर




लॉक डाउन और अवसर
सबसे पहले में आपको तमाशा मूवी का वो दृश्य याद करना चाहता हूँ जो ठीक मध्यांतर से पहले आता है जब वेद ( रणबीर कपूर), तारा ( दीपिका पादुकोण) को प्रपोज़ करता है।

तारा : जब से में कोर्सिका से वापस आयी हु ना, it’s like,  it’s like तुम मेरे साथ हो। समझ रहे हो? मुझे तुम्हारा नाम तक नहीं पता। कोई उम्मीद नहीं  है की में तुमसे फिर से मिलूंगी? मगर में तुम्हारे साथ हूँ यह पॉसिबल है? ऐसा फील करना? मुझे पहले मालूम नहीं था।
वेद : और फिर में मिल गया।
तारा : नहीं! मुझे मिला एक प्रोडक्ट मैनेजर जो एक शहर में रहता है, जो बहोत वेल behaved है, पोलाइट है, Decent है।
वेद : तो, तारा तो में हु एक प्रोडक्ट मैनेजर; में रहता हु एक शहर में में वो डॉन थोड़ी हु तारा, वो तो एक्टिंग थी ना वो में एक रोल प्ले कर रहा था; और यह में रियल में हूँ
तारा ; नहीं..।
वेद : नहीं का क्या मतलब?
तारा : तुम रियल में डॉन हो और इंटरपोल के अफसर और यहां तुम एक्टिंग कर रहे हो यह तुम रोल प्ले कर रहे हो, एक रेगुलर आदमी का रोल जो एक सेट पैटर्न पर चलता है, जो बगैर सोचे हुवे हर काम ऐसे ही करता है जैसे उसे करना चाहिए यह तुम नहीं हो वेद यह सब नकली है तुम तो नदी में मुँह दाल के पानी पीते हो यार, जानवर की तरह तुम तो पहाड़ो से बाते करते हो तुम वो हो वेद क्या हो गया है तुमको?

कोरोना वायरस से जो लॉक डाउन हुआ है, उससे  हम सब को एक सुवर्ण तक मिली हैउसने हमको एक ऐसे इंसान से मिलने का मौका दिया है जो था तो हमारे साथ लेकिन कभी हमने उसे महत्व दिया ही नहीं वो इंसान और कोई नहीं हम खुद है रोजींदी ज़िन्दगी में हम इतने उलझ गए थे की किसीको खुद के लिए वक़्त ही नहीं था हम सब में एक वेद है जो अलग अलग रोल प्ले करता रहता है जब की अंदर अंदर ही कोई जगह पे घुटन महसूस करता होगा हर एक इंसान में कोई एक बात तो होगी जो औरो से उसको अलग करती होगी लॉक डाउन में आपको यही चीज़ ढूंढनी है अपनी रुकी हुई सी ज़िन्दगी में फिर से आशा की ज्योत जला सकते हो 
तमाशा मूवी में भी ऐसा ही प्रस्तुत किया गया है हम रोजींदी ज़िन्दगी में कोई और है और अंदर से कोई और है वेद हम में से ही कोई एक है क्या आपने महसूस किया है की जब आप छुट्टियों में घूमने जाते हो तो आप के अंदर एक अलग प्रकार की ही एनर्जी होती है आप एक अलग इंसान बन गए होते हो क्यूंकि आपको अपनी मनपसंद चीज कर रहे होते हो हम कोई ना कोई रोल प्ले कर रहे होते है कोई मैनेजर का तो कोई सेल्स पर्सन का कोई अकाउंटेंट,  कोई  एग्जीक्यूटिव का तो कोई इंजीनियर का
इन दिनों आप एक एक दिन को यादगार बना सकते हो जरा सोचिये कब आपको अपने परिवार के साथ रहने का वक़्त मिला था? कब आपको अपने बारे में सोचने का वक़्त मिला था? कब आपने बच्चे के साथ में कोई गेम खेला था? कब आपने अपने माता पिता के साथ पुराणी बाते करके खूब मजे किये थे? कब आपने अपनी बीवी को काम में मदद की थी? कब आपने अपने घर पे  फुल फॅमिली पूरी मूवी देखि थी?
मुझे यहाँ पे ब्लफ्फ़मास्टर मूवी का बोमन ईरानी का खूबसूरत संवाद याद आता है जब वो अभिषेक बच्चन को (रॉय) को समझाता है
तुम्हे ऐसे कितने दिन याद है रॉय? तुम्हारी पहली जॉब? पहला सूट? पहली सैलरी? जब तुमने पहली बार एक लड़की को छूआ, पहली बार चूमा, जब पहली बार तुम्हारा दिल धड़का ? तीस साल की ज़िन्दगी में तुम्हे ऐसे कितने पल है जो तुम्हे याद है? , , , , १०, १५, ३०,.. ३० साल में सिर्फ ३०??? बाकी के दिन का क्या हुआ रॉय” ?
अब में आपको पूछता हूँ की आपको अभी तक के कितने दिन या पल याद है?
जबसे २३ मार्च से लॉक डाउन हुआ है, हम सबको यह सुवर्ण तक मिली है की हम अपने अंदर झांक कर देखे और एक एक पल को यादगार बनाये नयी नयी गेम्स खेले, रूबिक्स क्यूब को सॉल्व करे और बच्चो को सिखाये, पेंटिंग करे, स्टोरी लिखे, योगासन चालू करे, कुकिंग सीखे, नया सॉफ्टवेयर सीखे,  फिर से अपना बचपन जिए, फिर से सिखने की चाहत को पैदा किया जाए
हमारे इर्द गिर्द इतनी सारी नेगेटिविटी फैली है की हम अपने आप को हेल्पलेस महसूस करने लगते है और हां, आप अपने धर्मग्रंथ को पढे और उसमें लिखी बातें समजने की कोशीश करे। मुझे यकीन है ये आपकी आंतरीक शक्ति को जाग्रुत करेगा, एक उमदा मानवीय भावना को बढावा देगा।
जितने भी दिन हमें मिले है उसमें हमने हमारे ज्ञान में, हमारे स्किल्स में जो इज़ाफ़ा करेंगे वोही हमारी असली सक्सेस है वो पांच मिनट जो जनता कर्फ्यू में शाम पांच बजे को सबने एक साथ घंटनाद और तालिया बजा कर सब डॉक्टर्स, नर्सेज, पुलिसकर्मी और सभी सेवा कार्यो के साथ जुडी हुई आवाम के लिए बजाया था वो पल  मुझे ज़िन्दगी भर याद रहेगा आप को ??

दूसरा यादगार पल पांचवी अप्रैल को रात ९ बजे करने जा रहे है आप ऐसे कितने पल बनाने वाले हो? अगर अभी नहीं सोचा तो अभी भी देरी नहीं हुई है, इन दिनों आप अपना पसंदीदा कार्य करे और मुझे विश्वास है की हम सब एक पॉजिटिव भारत और विश्व बना सकते है

P.N. - सभी  पति के लिए यह  फील करने का मौका है की उनकी हाउसवाइफ पुरे दिन-भर घर में अकेले कैसे फील करती होगी उनकी भी अपनी ख्वाहिश होती है पर घर, पति, और बच्चो में अपना जीवन समर्पित कर देती है आप भी २१ दिन का हाउस-हस्बंड बन कर देखे तनाव भरी जिंदगी में आज कल पति-पत्नि के बिच जो मन – मुटाव हो रहे है, वो मन मुटाव कम होंगे और रिश्ते मधुर बन जाएंगे  - ये वादा रहा।

~ Darshan Gandhi

Friday, 13 March 2020

यंग इन्जिनीयर्स – उनके सपने, उनके रास्ते और चुनौतीयां - Level 1




९०के दशक में बच्चों से पूछें की क्या बनना है तो बोलेंगे डोक्टर्स, इन्जिनियर, साइंटीस्ट, पायलट, टिचर या IAS अफसर! पर सन २००० के बाद जो क्रांति आइ, जो नई जनरेशन आइ है उन्हें पता है की उन्हे कम्प्युटर इन्जिनियर बनना है और ऑरेकल – SQL में पारंग़त होंगे। डॉक्टर बनेंगे और फिर न्युरोलोजीस्ट बनेंगे। M.SC Phyisics के बाद Quantam Physics में PhD करेंगे। ये हैं यंग इंडीया के युवा!

आज शिक्षा का स्तर बदल गया है। ब्लेक बोर्ड का कलर ही अब चेन्ज हो गया है, ये ही सबसे बडी बात है.. है ना?

व्हाइट बोर्ड के साथ साथ प्रोजेक्टर भी स्कूल का आवश्यक अंग़ (और अभिभावको की पसंद) बन गया है। बच्चे स्मार्ट बन गये है तो उनके लिए चिजें भी स्मार्ट आने लगी है। प्रोजेक्टर पे उन्हें स्मार्ट एज्युकेशन दिया जा रहा है।
नर्सरी के बच्चों को यु-ट्युब पता है। बच्चे अब अपना प्रोजेक्ट गुगल देवता की क्रीपा से करने लगे हैं। अच्छी बात है, टेक्नोलोजी के साथ साथ सब को अपग्रेड होना चाहीये पर क्या फाउंडेशन सही है?

बच्चे क्या पढ रहे है, क्या समज रहे है ये भी तो देखना चाहिये।  उत्तोलन (leverage) क्या है वो पता नहीं है और Quantam Physics की पढाइ कीए जा रहे है।

इधर पिंकी बिटीया मिकेनिकल इंजीनियर बन गइ। छत पर कपडे सुखाने की रस्सी लेने के लिए दुकान पर गइ तब ताउसे “कितने मिटर रस्सी दूं?” का सवाल सुना तो  पिंकी बिटीया के सामने पूरे चार साल के वाइवा नजर के सामने आ गए!!!!!

उधर रोहन भैया ताजे ताजे इंजिनियर बनकर निकले है। जोब न मिलने पर सरकार की जमकर बुराइ कर रहे है। तभी एक कंपनी ने इंटर्व्यु के लिए बुलाया। रोहन भैया फेसियल करा के, सूट बूट पहन कर इंटर्व्यु देने पहुंच गए।  उन्हें वर्नियर कैलिपर से एक टूकडे की लंबाइ नापने को बोला गया। रोहन जी तो वनिर्यर कैलिपर को एलियन का शस्त्र समज बैठे। पब जी या काउन्टर स्ट्राइक में भी ये वेपन नहीं देखा!!!! इन्टर्व्यु लेने वालो को लगा की ये फिर से सरकार को गाली देने लगेंगे इस से अच्छा एक मौका और दे देते है। पूछा गया की “एक फिट में कितने इंच एवम कितने सेंटीमिटर होते है?” लो भैया, फेसियल भाप बन के उड गया, टाइ घुटन पैदा करने लगी, डी हाइड्रेशन की अवस्था आने वाले थी की सामने पडा पानी का ग्लास रोहन जी ने खाली कर डाला!!!

उपर वाले वाक्ये मजाक नहीं है। कहीं ना कहीं हकीकत भी है। चलो एक हकीकत से रुबरु होते है।

EZ ENGINEERS PVT. LTD. के स्थापक एवम संचालक श्री जेठवानीजीने इंजिनियरींग के छात्रों से किये गए इंटर्व्यु के संदर्भ में एक बात बताइ। उन्होंने बताया की स्ट्रक्चर इंजिनियर की पोस्ट के लिए जब इंटर्व्यु लिया तब एक गोल्ड मेडालिस्ट युवा भी उस इंटर्व्यु में शामिल था। उस युवा ने डिफ्लेक्शन फोर्म्युला, बेंडींग मोमेन्ट डायाग्राम, आरसीसी डीझाइन स्टेप्स आदी सभी सवाल जो सिलेबस में शामिल थे उसके एकदम सटीक उत्तर दिये। पर समस्या अब शरु होती है..जैसे ही जेठवानीजी ने युवा को एक ट्रेडीशनल स्टिल कनेक्शन का फोटो दिखाकर पूछा की ये कौन सा कनेक्शन टाइप है..सिंप्ली स्पोर्टेड या फिक्स्ड? वो युवा निरुत्तर रहा। जेठवानी जी कइ शहर घुमे मगर ये ही हाल रहा।

जेठवानी जी का कहना है की कोलेज बहुत अच्छा पढाते है मगर उनके पास सिर्फ चार साल होते है। उन चार सालों में उन्हें थियरी और प्रेक्टीकल्स करवाने होते हैं। कोलेज एक अच्छा बेझ बनाकर देता है मगर युवाओं को उस बेझ से थोडा उठकर छ्लांग लगानी होगी। पर युवा छलांग लगाना तो दूर  कभी कभी मूलभूत चिजों पर भी जोर नहीं देते। हालांकी सभी युवा ऐसे नहीं है। कई कोलेज के प्रोफेसर्स ऐसे हैं जो युवाओं को आगे कैसे बढा जाए, कोलेज के गेट के उस तरफ भी क्या कीया जाये उसकी गाइडन्स देते है। जो युवा उस रास्ते पे चलते हैं वो कामयाबी को पा भी लेते हैं।

LEVEL 1 चेप्टर यहीं खतम कर रहा हूं। LEVEL 2 में कुछ और रोचक बाते करेंगे पर उससे पहेले कहना चाहुंग़ा की EZ ENGINEERS PVT. LTD., Vadodara, Gujarat based  कंपनी है जो स्ट्रकचर डिझाइन की प्रोफेशनल सर्वीस (Design & Engineering) और ट्रेनिंग में बेजोड है। कंपनी आप को स्ट्रकचर डिझाइन के कन्सेप्ट की उत्क्रुष्ट ट्रेनिंग़ देती है जिस में प्रेक्टीकल थियरी के साथ साथ सोफ़्टवेर का प्रेक्टीकल Know How & Knowledge देते है; और साइट विझिट भी कराइ जाती है। इस कंपनी में पूरे देश से B.E. / M.E CIVIL के स्टुडन्टस तो आते ही है साथ साथ प्रोफेसर्स और मैनेजर्स भी आते है जो Structural Engg. के प्रोफेश्नल कोर्सीस करके अपने कैरीयर को एक नया आयाम देते है।

आप www.ezengineers.in या 9825106264 पे कोल कर के जरूरी इन्फोर्मेशन ले सकते है।

LEVEL 2 जल्द ही पोस्ट करने जा रहा हूं…LEVEL 1 अपने दोस्तो, स्नेहीजनों तक पहोंचाइये।

 “Excellence is a continuous process and not an accident.” – Dr. A.P.J. ABDUL KALAM

~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 28 January 2020

#HumVapasAayenge हम आएंगे अपने वतन!


‘हम आएंगे अपने वतन हाजी साहब…और यहीं पे दिल लगाएंगे, यहीं पे मरेंगे…और यहीं के पानी में हमारी राख बहाई जाएगी।’



ये सिर्फ डाइलोग नहीं, कश्मीरी पंडीतो की जिंदगी है जो शायद फिल्म “शिकारा” बयां कर पाये!


कुछ ऐसी घटनाएं इस दुनिया में घटीत हो जाती है जीसे मिटाने की कोशीश की जाती है, पर वो मिटती नहीं है।
उन घटनाओं को छेडने से लोग कतराते हैं क्युंकी या तो घाव फिर से उभर आएंगे या तो उनको फिर से जख्मी किया जायेगा। मगर फिर भी कुछ लोग साहस जुटा लेते हैं। वैसा ही साहस किया राहुल पंडीताजीने "Our Moon has Blood Clots" लिखकर और फिर प्रख्यात निर्माता - निर्देशक विधु विनोद चोपराजीने फिल्म बनाकर।

शिकारा मुवी का प्रिव्यु पढें निचे दी गइ लिंक पर।

https://filmypanchaat.blogspot.com/2020/01/movie-preview-shikara.html

Sunday, 29 December 2019

Nexplora – नवचेतना का उत्सव !


P.N. : ये पोस्ट एस्टर पब्लीक स्कूल के मार्केटींग के लिए या फिर मेरी बेटी उस स्कूल में पढ रही है इस लिए नहीं लिखा; मैंने इस लिए लिखा की इस तरह की इवेन्टस हर जगह होनी आवश्यक है।

दोस्तों, २०१९ के कुछ ही दिन शेष बचे हैं। आशा है पिछले साल की मधुर यादें आपको आने वाले साल के लिए उत्साहीत करेगी; और खट्टी यादें अनुभव बनकर मार्गदर्शन का काम करेगी।

तो इस साल की आखरी पोस्ट लेकर आप के समक्ष उपस्थीत हूं। कुछ दिनो  पहले जब हम पेरेन्टस मिटिंग के लिए (एस्टर पब्लीक स्कूल) गए तब प्रिन्सीपल मेडमने बताया था की इस बार एन्युअल फंक्शन के बजाए हम कुछ नया करेंगे और इसमे पेरेन्टस भी इन्वोल्व होंगे।
इस बात को लेकर मैं और मेरी वाइफ काफी उत्साहीत थे की आखीर क्या होगा इस बार! हर स्कूल में एन्युअल फंक्शन होते हैं, और बच्चे एवम् माता – पिता काफी उत्साहीत नजर आते हैं। बच्चे अपना पर्फोर्मन्स देते है और माता –पिता एवम् शिक्षक गण उनके साक्षी बनते हैं। पर एस्टर पब्लीक स्कूलने तो ये कुछ नया करने की ठानी!
आखीर कार हमें २१ डिसम्बर को Nexplora – Inspiring Minds में शरीक होने का न्योता मिला। सभी पेरेन्टस काफी उत्सुक थे। सुबह ११ बजे से ४ बजे तक स्कूल में ही कुछ इवेन्ट्स थे ऐसा पता चला। हम दोनों हमारी नन्ही गुडीया को लेकर स्कूल को चल दिए। ११:३० तक पहोंचे और देखा तो स्कूल आकर्षक रुप में सजा था।


ग्राउन्ड फ्लोर पे फूड स्टोल रखे थे। हाल ही में शरु किए गए प्रि – नर्सरी क्लास की सजावट देखते ही बन रही थी। मैं अपने मोबाइल से फोटोग्राफी कर रहा था की अचानक “मोगली” मेरे सामने प्रकट हुआ। वो अपने दोस्त “बलु” को ढूंढ रहा था। मैने आश्वासन दीया की “बलू” मिलेगा तो मैं उसे ग्राउन्ड फ्लोर पे सब को एन्टरटेईन कर रहे “मोगली” को मिलने के लिए भेजुंगा।
सीढींयो पे एस्टर पब्लीक स्कूल के होनहार स्टुडन्टस हमे आमंत्रीत कर रहे थे और गंतव्य स्थान के लिए मार्गदर्शन दे रहे थे। उनका उत्साह देखते बन रहा था।

स्कूल की टेरेस पे “नेक्षप्लोरा” आयोजीत कीया गया था, पर जब हम पहूंचे तो उससे पहले ही कई उत्साही माता – पिता पहले पहुंच चूके थे; इस लिए भीड को नियंत्रीत करने हेतु स्कूल संचालक मंडल ने अनोखी व्यवस्था कर रखी थी। टोप फ्लोर पे तीन क्लास रूम को मनोरंजन खंड में परिवर्तित कर दीया था। एक में तंबोला चल रहा था, एक में क्राफ्ट, ड्रोइंग जैसी एक्टीवीटी चल रही थी तो एक में गीत – संगीत का कार्यक्रम था। हमारा परिवार गीत – संगीत के प्रति ज्यादा आकर्षीत हुआ तो उस रुम में गए। म्यूझीक टिचर्स बच्चो एवम् माता – पिता को गाना गाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। हमने भी भूषिता और उसकी दोस्त अन्वी को प्रेरित किया तो फिर बच्चो ने भी अच्छा प्रतिभाव दिया!





क्रिसमस के अनुरुप दोनो बच्चोंने साथे मिलकर जिंगल बेल्स गाया। उनके बाद श्रीमतिजीने मुझे प्रेरित किया तो मैं भी थोडा गुनगुनाने के लिए गया। “छोगाडा” गाने का ओरिजिनल फोक वर्झन “रंगलो, जाम्यो कालिंदी ने घाट..” गाकर सुनाया और उसके बाद एक हिन्दी “माइक्रोफिक्शन” भी पेश की।

हमारे दोस्त संजय कुमार झाने पंकज उधास की गझल मधुर आवाज में पेश की। बच्चों एवम बडोने गाने सुनाये तो कुछ बच्चोंने कोंगो पर अपने हाथ की दस्तक दी। हमें ये “म्युझीक वेइटींग रूम” छोडने का मन  तो नहीं हो रहा था पर उपर “नेक्षप्लोरा” देखने के लिए मन बावरा हो रहा था।

उपर पहोंचते ही क्लास टिचर “दिव्या मेडम”ने अभीवादन कीया और हमे टेरेस पर आयोजित नेक्षप्लोरा इवेन्टमें शरीक हुए।
टेरेस में शमा कुछ देखते ही बन रहा था। मेथ्स , साइन्स, हिन्दी ,अंग्रेजी विषय के इनोवेटीव स्टोल्स लगे हुए थे। जहां आप को बच्चे अपने इनोवेशन्स और गेम्स से अचंबीत करने के लिए कार्यरत थे। बच्चोंने कार्डस, पोट्स, पेइन्टींग्स और अन्य कलाक्रितीयां बनाइ थी वो भी देखने एवम् खरीदने के लिए स्टोलस पर मौजुद थी। सभी शिक्षक गण उनका उत्साह बढा रहे थे। CMD श्री शर्माजी एवम् प्रिन्सीपल मेडम सोनियाजी सभी का मार्गदर्शन एवम् निरिक्षण करते दिख रहे थे।


अभी पहले स्टोल पर पहुंचे की तभी हमारे मित्र संपत कुमार और उनका परिवार मिल गया। सभी का उत्साह देखते बन रहा था। बच्चों के इनोवेशन (एर प्युरिफायर, ट्राफिक कंट्रोल इत्यादी) तो शानदार थे ही पर जब वो हर एक प्रेक्षक को समजाने का जो कोन्फिडन्स था वो भी काबिल-ए-तारीफ था। हमने उनके इनोवेशन्स देखे, समजे; गेम्स खेली (हमारे ज्ञान का हमें पता चल गया!!!), कुछ में इनाम जिते भी! भूषिता और बच्चों ने जो कार्डस बनाये थे वो हमने खरिदे! खूब सारी फोटोग्राफी की!


नेक्षप्लोरा इवेन्ट उन सब इवेन्ट्स से एक कदम आगे था जो एक स्कूल के एन्टरटेइन इवेन्ट में होना चाहिए! यहां पे बच्चों के हर सबजेक्ट के अनुरुप उनके कौशल को एक्ष्प्लोर कर नेक्स्ट लेवल पे ले जाकर एक प्लेटफोर्म पर दिखाया! और ये प्लेटफोर्म सिर्फ किताबी नहीं था। सब से मजेदार ये बात थी की यहां पे पेरेन्ट्स प्रेक्षक दिर्घा में नहीं बैठे थे, उनको इस इवेन्ट का हिस्सा बनाया गया!





हर छोटी छोटी चिज पे ध्यान दिया गया था चाहे वो ग्राउन्ड फ्लोर पे सब को एन्टरटेइन कर रहा स्टूडन्ट “मोगली” हो, चाहे वो शानदार “वेइटींग रूम्स” हो, चाहे वो “मुस्कुराइए – आप एस्टर में है” वाला स्माइली स्टीकर बोर्ड हो, चाहे वो प्लास्टीक ग्लास से बना स्नोमेन हो, चाहे वो सिढीयों की दिवारो पे सजाये मोटीवेशनल क्वोट्स हो या फिर आप के प्रतिभाव के लिए बना “पोस्ट इट” बोर्ड हो!




मैं नेक्षप्लोरा एवेन्ट से काफी प्रभावीत हुआ। ये पोस्ट एस्टर पब्लीक स्कूल के मार्केटींग के लिए या फिर मेरी बेटी उस स्कूल में पढ रही है इस लिए नहीं लिखा; मैंने इस लिए लिखा की इस तरह की इवेन्टस हर जगह होनी आवश्यक है। अगर स्कूल, कोलेज और कंपनीया भी इस तरह के इवेन्ट्स से प्रेरित हो तो स्टुडन्ट्स और एंप्लोयी इनोवेशन के प्रति उत्साहित नजर आएंगे तथा अपनी काबिलीयत दिखाने का अवसर मिलेगा! (और ये तभी संभव है जब ये पोस्ट आप अपने मित्र गण के साथे शेर करे और अपने सोशियल प्लेटफोर्म पर भी साझा करे। धन्यवाद!)





APS - 
नेक्षप्लोरा हर साल आयोजीत हो ऐसी आप से उम्मीद रखता हूं!
आप सभी मित्र गण को नव वर्ष २०२० के लिए अग्रीम शुभकामनाऍं! सुरक्षीत रहें, स्वस्थ रहें, व्यस्त रहें, मस्त रहें!
जय हिन्द!
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गोपाल खेताणी








Saturday, 16 November 2019

इंजीनियरींग, टेक्नीकल नॉलेज और जोब!


आज का युग चेलेन्जींग है। हर रोज कुछ न कुछ इनोवेशन हो रहा है। कल के बच्चे जो चंदामामा को देख रहे थे वे आज उनेके चेहरे के पीछे क्या है (डार्क साइड ओफ ध मून!) वो देखने लेन्डर को उनके पास भेज रहे है। कहने का मतलब ये है की हर जगह कुछ न कुछ नई संभावनाऍ देखी जा रही है।

पर पढाइ में कुछ नया पन आ रहा है? मैं कुछ पोइन्टस आप के सामने पेश करुंगा पर इससे पहले कुछ युवा इंजीनियर्स जो अभी अभी एम्पलोइ (फ़्रेशर्स) बने हैं उनके अनुभव पढते हैं।


मम्मी जल्दी खाना दो मेरी पहली क्लास केमिस्ट्री की है, अगर लेट हो गयी तो सर क्लास में आने नहीं देंगे! तभी मम्मी की आवाज़ आई, जल्दी उठ जा आज ऑफिस नहीं जाना क्या! और ये लो केमिस्ट्री की क्लास छूट गयी! एक और कॉलेज का सपना टूट गया! जब से कॉलेज ख़त्म हुआ है तब से मेरी सुबह कुछ ऐसे ही होती है। वैसे तो ऑफिस में सभी लोग बहुत अच्छे हैं पर कॉलेज की भी अपनी ही बात थी। अगर काम की बात की जाए तो यहाँ आने के बाद पता चला कि हम जो कुछ भी कॉलेज में पढ़ कर आए थे ज़माना उससे कई गुना आगे निकल चुका है। मोबाइल फोन इंटरनेट कंप्यूटर आदि के बाद भी हमें वो ज्ञान नहीं मिला जो कि हमारे जीवन को एक नए वातावरण में ढालने के लिए आवश्यक था। कई बच्चों को नौकरियाँ नहीं मिलीं, अच्छे अंक लाने के बाद भी। वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे बच्चे भी थे जिन्हें इंजीनियर नहीं बनना था परंतु माता पिता की खुशी या दबाव के कारण इस क्षेत्र में आना पड़ा। उनका भविष्य क्या होगा पता नहीं। कहीं ना कहीं हमें ज़रूरत है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उचित रूप से सुधार करें। यदि हमें कॉलेज में ही उन सोफ्टवेयरस की शिक्षा दी जाती जो कि हमारी इंजीनियरिंग ब्रांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जैसे कि ऑटो कैड,स्काडा,पी.एल.सी, माइक्रो स्टेशन आदि, तो नौकरियाँ पाना तथा नौकरी करना दोनों ही काम हमारे लिए सरल हो जाते। ऐसी महत्वपूर्ण चीज़ों को सीखने के लिए हमें अलग अलग कोचिंग क्लास में जाकर भारी फ़ीस व समय दोनों लगाने पड़ते हैं जबकि यही चीज़ें हम कॉलेज में ही सीख सकते थे। इसलिए केवल उतना ज्ञान ही काफी नहीं है जो कि हमने किताबों में लिख दिया और बच्चों को उसे याद करने के लिए स्कूल कॉलेज में भेज दिया, बल्कि समय के अनुसार उसे बदलना और सुधारना भी अति आवश्यक है। तथा हर कोई बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता, हर बच्चे में एक अलग गुण होता है, बस ज़रूरत है तो उसे समझने और निखारने की। भविष्य किसी ने नहीं देखा परंतु एक अच्छे भविष्य की कल्पना एक व्यवस्थित वर्तमान से ही शुरू होती है।
~ लोमशा

आज की दुनिया में एक सफल इंसान वही है जो अपने व्यवसाय और निजी जीवन में संतुलन बनाकर रखे। परंतु ऐसा कम लोग ही कर पाते हैं। लोग अपने व्यवसायिक जीवन में इतना खो जाते हैं कि परिवार को समय नहीं दे पाते। इसका एक कारण ये है कि जब वे कालेज में होते हैं तो उन्हें आने वाले समय से उतना परिचित नहीं कराया जाता जितना होना चाहिए। केवल किताबी ज्ञान उन्हें वास्तविक स्थिति के लिए तैयार नहीं कर पाता।

आजकल की शिक्षा प्रणाली में  परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। बच्चों को प्रैक्टिकल ज्ञान देने में बढ़ोतरी की काफी जरूरत है। किताबी ज्ञान केवल हमें विषय से रूबरू कराता है परंतु असल में हो क्या रहा है और कैसे हो रहा है ये उस कार्य को करने से ही पता चलता है। इसलिए कालेज में समय-समय पर वर्कशॉप आयोजित होते रहने चाहिए। व्यवसाय में जाकर एक इन्सान को किन परिस्थितियों का सामना करना होगा इसकी तैयारी कालेज में ही हो जानी चाहिए।
~नीरज सिंह

जब हम कॉलेज में होते हैं तो सिर्फ हमें यही सोचना होता है कि बस हमारे मार्क्स अच्छे आ जाएं और किसी अच्छी कंपनी में जॉब मिल जाए तथा जल्दी-जल्दी हमारी सैलरी भी बढ़ती रहें और हमारी पोस्ट भी। पर हम कभी यह नहीं सोच पाते कि जब हम कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाएंगे तो हमें किन किन बदलावों का परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और ना ही हमारा कॉलेज हमें कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाने के लिए तैयार करता है।
हम जब कॉलेज में होते हैं तो अगर हमें कोई विषय समझ नहीं आता तो हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह अपने शिक्षकों से विषय जाकर समझ लेते हैं पर इसके विपरीत जब हम जॉब में होते हैं और हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम यहां एक अच्छे कार्यकर्ता के रूप में बहुत से जाकर नहीं समझ सकते क्योंकि यहां यह साबित होगा कि हम उस कंपनी के ही लायक नहीं है। जब हम कॉलेज में होते हैं तब हम दोस्तों के साथ शिक्षकों के साथ बेझिझक अच्छे से वह सामान्य बर्ताव करते हैं इसके विपरीत जब हम जॉब लाइफ में आते हैं तो हमारे साथ काम करने वाले सहकर्मी और ज्यादातर ऐसे सहकर्मी जो वरिष्ठ होते हैं तो हमारा उनसे सामान्य बर्ताव नहीं हो पाता है। शुरुआत में तो काफी ज्यादा झिझक रहती है क्योंकि शुरुआत में हम लोग नए कार्यकर्ता होते हैं उनके यहां तो वह लोग हमारा काफी ज्यादा निरीक्षण करते हैं इसलिए हमें जरूरत है कि हम बच्चों को कॉलेज से ही जॉब लाइफ के लिए तैयारी करवाएं ताकि उन्हें कॉलेज से जॉब में जाने के बाद ऐसी परेशानियों का सामना ना करना पड़े।
~शालिनी मिश्रा


तो देखा आपने की युवा इंजीनियरों की कुछ समस्याए है। क्या कीया जाए उससे पहले मैं अपना अनुभव कहना चाहुंगा।

१९९९ में डीप्लोमा फेब्रीकेशन टेक्नोलोजीमें दाखिला लिया तब उस प्रोग्राम को पूरा रिडिफाइन किया था। (HOD जी.डी.आचार्य एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत की थी) इस डीप्लोमा की खास बात थी की लास्ट सेमेस्टर से पहले बच्चों को ६ - ६ महीने की (पूरा १ साल) दो कंपनी में ट्रेनींग होती थी। तो इस लिए व्यवसायिक जिवन में प्रवेश करने  से पहले हम पूरे तैयार हो जाते थे। मुजे तब भी ये लगा की कोलेज के पास इतने सारे मेन्युफेक्चरींग ड्रोइंग्स थे की वो कैसे पढे जाते हैं उनकी शिक्षा देते तो उन्हें कैसे तैयार करे जाते वो हम आसानी से समज पाते।

ठीक वैसा ही मैने डीग्री प्रोडक्शन इंजीनियरींग करते वक्त भी पाया। (HOD मंगल भट्ट एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत कर नया करीक्युलम बनाया) यहां भी हमे ३ महीने की ट्रेनिंग लेनी थी जो कारगर साबीत हुइ। पर बात वहीं पे अटकी। जो चल रहा है इंडस्ट्री में वो तो हमें पता ही नहीं।

अब आते हैं सोल्युशन पर। तो सोल्युशन ये है की या तो कॉलेज अपने करीक्युलम में लगातार इम्प्रुवमेन्ट लाये (प्रेक्टीकल तौर पे) या फिर इंजीनियरिंग कम्प्लीट करने से पहले स्टुडन्ट को बाहर से ये ज्ञान लेना है ।

१ - सोफ्टवेर / हार्डवेर साइड डेवेलोप हो। कम्प्युटर का भी एड्वान्स लेवल नॉलेज होना बहुत ही जरूरी है। हर स्ट्रीम के जरूरी सोफ्टवेर के लेटेस्ट वर्जन का अनुभव छात्रों को मिले। 
२ - एक फूट में कितने मिलि मीटर, सेन्टी ंमीटर और इंच होते है ये अगर फाइनल यर स्टुडन्ट को मालुम  नहीं तो फिर उसे शिकायत करने का हक्क नहीं की उसे नौकरी नहीं मिल रही। ये सिर्फ एक उदाहरण है। बेझीक नॉलेज होना बहुत ही आवश्यक है जो मुझे लगता है बहुत ही कम छात्रों के पास है (शायद वो ही गंभीर है और उतने हीं चूने जाते हैं)।
३ - कॉलेज के बाहर ही रिआलीटी है वो समजने की और समजाने की जरूरत है। रंग दे बसंती का डीजे (आमिर खान) याद है न? "गुल्ल्बो..कॉलेज के गेट के इस तरफ हम जिंदगी को नचाते है.. डीम लक लक दे डीम लक लक.. और गेट के उस तरफ जिंदगी हम को नचाती है.. डीम लक लक दे डीम लक लक...।" 
४ - कोन्फीडन्ट होना अच्छी बात है पर ओवर कोन्फीडन्स और एटीट्युड आप को जोखीम में डाल सकते है! और इस में झहर घोल सकता है आपका प्रोपर कम्युनिकेशन का अभाव। अगर आप अच्छे से अपने आप को, अपनी नॉलेज को एक्स्प्रेस नहीं कर पाते तो सिलेक्शन होना या फिर प्रमोट होना मुश्किल है।
५ - सेलरी से ज्यादा ध्यान काम पर और अपने चोइस की फिल्ड पर दे। मुजे मेन्युफेक्चरींग पसंद है पर डीझाइन (इपीसी) आज कल ज्यादा सेलरी दे रही है तो मैं उसमे चला जाता / चली जाती हूं - ये सोच लंबे केरीयर ग्राफ के लिए उचित नहीं है। शुरु के दो साल सिर्फ आप सिखने में बिताए; ना की सेलरी गिनने में। बाबा रणछोड दास चांचड उर्फ रेन्चोने कहा था की "दोस्त, एक्सलंस के पीछे भागो, सक्सेस जख मार के पीछे आएगी!"

अब विश्राम... कुछ और पोइंट्स बाद में। अगर कोइ कॉलेज के प्रोफेसर्स इस आर्टीकल को पढ रहे है तो गुजारीश है की छात्रों को प्रेक्टीकल ज्ञान बांटीए, ज्यादा से ज्यादा वर्कशोप्स और छोटी ही सही पर ट्रेनींग करवाइए।

और फाइनल और प्रिफाइनल यर्स स्टुडंट्स एवम न्यु जोइनीझ, आप बेझीक्स पर ध्यान दिजीए। कुछ पैसे नये कोर्सीस सिखने में भी लगाइए, ये भी आप का एक इन्वेस्टमेंट है। (खुद का एक्सपिरीयंस है!)

ओल ध बेस्ट ! और हां "आल इज वेल" :)  हंमेशा याद रखीएगा!!!

~ गोपाल खेताणी

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद   का जन्म  1 जुलाई , 1933 को   यूपी के गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में   हुआ था।   उनके पिता मोहम्मद उस्मान सिलाई का काम करते थे...