Friday, 13 March 2020

यंग इन्जिनीयर्स – उनके सपने, उनके रास्ते और चुनौतीयां - Level 1




९०के दशक में बच्चों से पूछें की क्या बनना है तो बोलेंगे डोक्टर्स, इन्जिनियर, साइंटीस्ट, पायलट, टिचर या IAS अफसर! पर सन २००० के बाद जो क्रांति आइ, जो नई जनरेशन आइ है उन्हें पता है की उन्हे कम्प्युटर इन्जिनियर बनना है और ऑरेकल – SQL में पारंग़त होंगे। डॉक्टर बनेंगे और फिर न्युरोलोजीस्ट बनेंगे। M.SC Phyisics के बाद Quantam Physics में PhD करेंगे। ये हैं यंग इंडीया के युवा!

आज शिक्षा का स्तर बदल गया है। ब्लेक बोर्ड का कलर ही अब चेन्ज हो गया है, ये ही सबसे बडी बात है.. है ना?

व्हाइट बोर्ड के साथ साथ प्रोजेक्टर भी स्कूल का आवश्यक अंग़ (और अभिभावको की पसंद) बन गया है। बच्चे स्मार्ट बन गये है तो उनके लिए चिजें भी स्मार्ट आने लगी है। प्रोजेक्टर पे उन्हें स्मार्ट एज्युकेशन दिया जा रहा है।
नर्सरी के बच्चों को यु-ट्युब पता है। बच्चे अब अपना प्रोजेक्ट गुगल देवता की क्रीपा से करने लगे हैं। अच्छी बात है, टेक्नोलोजी के साथ साथ सब को अपग्रेड होना चाहीये पर क्या फाउंडेशन सही है?

बच्चे क्या पढ रहे है, क्या समज रहे है ये भी तो देखना चाहिये।  उत्तोलन (leverage) क्या है वो पता नहीं है और Quantam Physics की पढाइ कीए जा रहे है।

इधर पिंकी बिटीया मिकेनिकल इंजीनियर बन गइ। छत पर कपडे सुखाने की रस्सी लेने के लिए दुकान पर गइ तब ताउसे “कितने मिटर रस्सी दूं?” का सवाल सुना तो  पिंकी बिटीया के सामने पूरे चार साल के वाइवा नजर के सामने आ गए!!!!!

उधर रोहन भैया ताजे ताजे इंजिनियर बनकर निकले है। जोब न मिलने पर सरकार की जमकर बुराइ कर रहे है। तभी एक कंपनी ने इंटर्व्यु के लिए बुलाया। रोहन भैया फेसियल करा के, सूट बूट पहन कर इंटर्व्यु देने पहुंच गए।  उन्हें वर्नियर कैलिपर से एक टूकडे की लंबाइ नापने को बोला गया। रोहन जी तो वनिर्यर कैलिपर को एलियन का शस्त्र समज बैठे। पब जी या काउन्टर स्ट्राइक में भी ये वेपन नहीं देखा!!!! इन्टर्व्यु लेने वालो को लगा की ये फिर से सरकार को गाली देने लगेंगे इस से अच्छा एक मौका और दे देते है। पूछा गया की “एक फिट में कितने इंच एवम कितने सेंटीमिटर होते है?” लो भैया, फेसियल भाप बन के उड गया, टाइ घुटन पैदा करने लगी, डी हाइड्रेशन की अवस्था आने वाले थी की सामने पडा पानी का ग्लास रोहन जी ने खाली कर डाला!!!

उपर वाले वाक्ये मजाक नहीं है। कहीं ना कहीं हकीकत भी है। चलो एक हकीकत से रुबरु होते है।

EZ ENGINEERS PVT. LTD. के स्थापक एवम संचालक श्री जेठवानीजीने इंजिनियरींग के छात्रों से किये गए इंटर्व्यु के संदर्भ में एक बात बताइ। उन्होंने बताया की स्ट्रक्चर इंजिनियर की पोस्ट के लिए जब इंटर्व्यु लिया तब एक गोल्ड मेडालिस्ट युवा भी उस इंटर्व्यु में शामिल था। उस युवा ने डिफ्लेक्शन फोर्म्युला, बेंडींग मोमेन्ट डायाग्राम, आरसीसी डीझाइन स्टेप्स आदी सभी सवाल जो सिलेबस में शामिल थे उसके एकदम सटीक उत्तर दिये। पर समस्या अब शरु होती है..जैसे ही जेठवानीजी ने युवा को एक ट्रेडीशनल स्टिल कनेक्शन का फोटो दिखाकर पूछा की ये कौन सा कनेक्शन टाइप है..सिंप्ली स्पोर्टेड या फिक्स्ड? वो युवा निरुत्तर रहा। जेठवानी जी कइ शहर घुमे मगर ये ही हाल रहा।

जेठवानी जी का कहना है की कोलेज बहुत अच्छा पढाते है मगर उनके पास सिर्फ चार साल होते है। उन चार सालों में उन्हें थियरी और प्रेक्टीकल्स करवाने होते हैं। कोलेज एक अच्छा बेझ बनाकर देता है मगर युवाओं को उस बेझ से थोडा उठकर छ्लांग लगानी होगी। पर युवा छलांग लगाना तो दूर  कभी कभी मूलभूत चिजों पर भी जोर नहीं देते। हालांकी सभी युवा ऐसे नहीं है। कई कोलेज के प्रोफेसर्स ऐसे हैं जो युवाओं को आगे कैसे बढा जाए, कोलेज के गेट के उस तरफ भी क्या कीया जाये उसकी गाइडन्स देते है। जो युवा उस रास्ते पे चलते हैं वो कामयाबी को पा भी लेते हैं।

LEVEL 1 चेप्टर यहीं खतम कर रहा हूं। LEVEL 2 में कुछ और रोचक बाते करेंगे पर उससे पहेले कहना चाहुंग़ा की EZ ENGINEERS PVT. LTD., Vadodara, Gujarat based  कंपनी है जो स्ट्रकचर डिझाइन की प्रोफेशनल सर्वीस (Design & Engineering) और ट्रेनिंग में बेजोड है। कंपनी आप को स्ट्रकचर डिझाइन के कन्सेप्ट की उत्क्रुष्ट ट्रेनिंग़ देती है जिस में प्रेक्टीकल थियरी के साथ साथ सोफ़्टवेर का प्रेक्टीकल Know How & Knowledge देते है; और साइट विझिट भी कराइ जाती है। इस कंपनी में पूरे देश से B.E. / M.E CIVIL के स्टुडन्टस तो आते ही है साथ साथ प्रोफेसर्स और मैनेजर्स भी आते है जो Structural Engg. के प्रोफेश्नल कोर्सीस करके अपने कैरीयर को एक नया आयाम देते है।

आप www.ezengineers.in या 9825106264 पे कोल कर के जरूरी इन्फोर्मेशन ले सकते है।

LEVEL 2 जल्द ही पोस्ट करने जा रहा हूं…LEVEL 1 अपने दोस्तो, स्नेहीजनों तक पहोंचाइये।

 “Excellence is a continuous process and not an accident.” – Dr. A.P.J. ABDUL KALAM

~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 28 January 2020

#HumVapasAayenge हम आएंगे अपने वतन!


‘हम आएंगे अपने वतन हाजी साहब…और यहीं पे दिल लगाएंगे, यहीं पे मरेंगे…और यहीं के पानी में हमारी राख बहाई जाएगी।’



ये सिर्फ डाइलोग नहीं, कश्मीरी पंडीतो की जिंदगी है जो शायद फिल्म “शिकारा” बयां कर पाये!


कुछ ऐसी घटनाएं इस दुनिया में घटीत हो जाती है जीसे मिटाने की कोशीश की जाती है, पर वो मिटती नहीं है।
उन घटनाओं को छेडने से लोग कतराते हैं क्युंकी या तो घाव फिर से उभर आएंगे या तो उनको फिर से जख्मी किया जायेगा। मगर फिर भी कुछ लोग साहस जुटा लेते हैं। वैसा ही साहस किया राहुल पंडीताजीने "Our Moon has Blood Clots" लिखकर और फिर प्रख्यात निर्माता - निर्देशक विधु विनोद चोपराजीने फिल्म बनाकर।

शिकारा मुवी का प्रिव्यु पढें निचे दी गइ लिंक पर।

https://filmypanchaat.blogspot.com/2020/01/movie-preview-shikara.html

Sunday, 29 December 2019

Nexplora – नवचेतना का उत्सव !


P.N. : ये पोस्ट एस्टर पब्लीक स्कूल के मार्केटींग के लिए या फिर मेरी बेटी उस स्कूल में पढ रही है इस लिए नहीं लिखा; मैंने इस लिए लिखा की इस तरह की इवेन्टस हर जगह होनी आवश्यक है।

दोस्तों, २०१९ के कुछ ही दिन शेष बचे हैं। आशा है पिछले साल की मधुर यादें आपको आने वाले साल के लिए उत्साहीत करेगी; और खट्टी यादें अनुभव बनकर मार्गदर्शन का काम करेगी।

तो इस साल की आखरी पोस्ट लेकर आप के समक्ष उपस्थीत हूं। कुछ दिनो  पहले जब हम पेरेन्टस मिटिंग के लिए (एस्टर पब्लीक स्कूल) गए तब प्रिन्सीपल मेडमने बताया था की इस बार एन्युअल फंक्शन के बजाए हम कुछ नया करेंगे और इसमे पेरेन्टस भी इन्वोल्व होंगे।
इस बात को लेकर मैं और मेरी वाइफ काफी उत्साहीत थे की आखीर क्या होगा इस बार! हर स्कूल में एन्युअल फंक्शन होते हैं, और बच्चे एवम् माता – पिता काफी उत्साहीत नजर आते हैं। बच्चे अपना पर्फोर्मन्स देते है और माता –पिता एवम् शिक्षक गण उनके साक्षी बनते हैं। पर एस्टर पब्लीक स्कूलने तो ये कुछ नया करने की ठानी!
आखीर कार हमें २१ डिसम्बर को Nexplora – Inspiring Minds में शरीक होने का न्योता मिला। सभी पेरेन्टस काफी उत्सुक थे। सुबह ११ बजे से ४ बजे तक स्कूल में ही कुछ इवेन्ट्स थे ऐसा पता चला। हम दोनों हमारी नन्ही गुडीया को लेकर स्कूल को चल दिए। ११:३० तक पहोंचे और देखा तो स्कूल आकर्षक रुप में सजा था।


ग्राउन्ड फ्लोर पे फूड स्टोल रखे थे। हाल ही में शरु किए गए प्रि – नर्सरी क्लास की सजावट देखते ही बन रही थी। मैं अपने मोबाइल से फोटोग्राफी कर रहा था की अचानक “मोगली” मेरे सामने प्रकट हुआ। वो अपने दोस्त “बलु” को ढूंढ रहा था। मैने आश्वासन दीया की “बलू” मिलेगा तो मैं उसे ग्राउन्ड फ्लोर पे सब को एन्टरटेईन कर रहे “मोगली” को मिलने के लिए भेजुंगा।
सीढींयो पे एस्टर पब्लीक स्कूल के होनहार स्टुडन्टस हमे आमंत्रीत कर रहे थे और गंतव्य स्थान के लिए मार्गदर्शन दे रहे थे। उनका उत्साह देखते बन रहा था।

स्कूल की टेरेस पे “नेक्षप्लोरा” आयोजीत कीया गया था, पर जब हम पहूंचे तो उससे पहले ही कई उत्साही माता – पिता पहले पहुंच चूके थे; इस लिए भीड को नियंत्रीत करने हेतु स्कूल संचालक मंडल ने अनोखी व्यवस्था कर रखी थी। टोप फ्लोर पे तीन क्लास रूम को मनोरंजन खंड में परिवर्तित कर दीया था। एक में तंबोला चल रहा था, एक में क्राफ्ट, ड्रोइंग जैसी एक्टीवीटी चल रही थी तो एक में गीत – संगीत का कार्यक्रम था। हमारा परिवार गीत – संगीत के प्रति ज्यादा आकर्षीत हुआ तो उस रुम में गए। म्यूझीक टिचर्स बच्चो एवम् माता – पिता को गाना गाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। हमने भी भूषिता और उसकी दोस्त अन्वी को प्रेरित किया तो फिर बच्चो ने भी अच्छा प्रतिभाव दिया!





क्रिसमस के अनुरुप दोनो बच्चोंने साथे मिलकर जिंगल बेल्स गाया। उनके बाद श्रीमतिजीने मुझे प्रेरित किया तो मैं भी थोडा गुनगुनाने के लिए गया। “छोगाडा” गाने का ओरिजिनल फोक वर्झन “रंगलो, जाम्यो कालिंदी ने घाट..” गाकर सुनाया और उसके बाद एक हिन्दी “माइक्रोफिक्शन” भी पेश की।

हमारे दोस्त संजय कुमार झाने पंकज उधास की गझल मधुर आवाज में पेश की। बच्चों एवम बडोने गाने सुनाये तो कुछ बच्चोंने कोंगो पर अपने हाथ की दस्तक दी। हमें ये “म्युझीक वेइटींग रूम” छोडने का मन  तो नहीं हो रहा था पर उपर “नेक्षप्लोरा” देखने के लिए मन बावरा हो रहा था।

उपर पहोंचते ही क्लास टिचर “दिव्या मेडम”ने अभीवादन कीया और हमे टेरेस पर आयोजित नेक्षप्लोरा इवेन्टमें शरीक हुए।
टेरेस में शमा कुछ देखते ही बन रहा था। मेथ्स , साइन्स, हिन्दी ,अंग्रेजी विषय के इनोवेटीव स्टोल्स लगे हुए थे। जहां आप को बच्चे अपने इनोवेशन्स और गेम्स से अचंबीत करने के लिए कार्यरत थे। बच्चोंने कार्डस, पोट्स, पेइन्टींग्स और अन्य कलाक्रितीयां बनाइ थी वो भी देखने एवम् खरीदने के लिए स्टोलस पर मौजुद थी। सभी शिक्षक गण उनका उत्साह बढा रहे थे। CMD श्री शर्माजी एवम् प्रिन्सीपल मेडम सोनियाजी सभी का मार्गदर्शन एवम् निरिक्षण करते दिख रहे थे।


अभी पहले स्टोल पर पहुंचे की तभी हमारे मित्र संपत कुमार और उनका परिवार मिल गया। सभी का उत्साह देखते बन रहा था। बच्चों के इनोवेशन (एर प्युरिफायर, ट्राफिक कंट्रोल इत्यादी) तो शानदार थे ही पर जब वो हर एक प्रेक्षक को समजाने का जो कोन्फिडन्स था वो भी काबिल-ए-तारीफ था। हमने उनके इनोवेशन्स देखे, समजे; गेम्स खेली (हमारे ज्ञान का हमें पता चल गया!!!), कुछ में इनाम जिते भी! भूषिता और बच्चों ने जो कार्डस बनाये थे वो हमने खरिदे! खूब सारी फोटोग्राफी की!


नेक्षप्लोरा इवेन्ट उन सब इवेन्ट्स से एक कदम आगे था जो एक स्कूल के एन्टरटेइन इवेन्ट में होना चाहिए! यहां पे बच्चों के हर सबजेक्ट के अनुरुप उनके कौशल को एक्ष्प्लोर कर नेक्स्ट लेवल पे ले जाकर एक प्लेटफोर्म पर दिखाया! और ये प्लेटफोर्म सिर्फ किताबी नहीं था। सब से मजेदार ये बात थी की यहां पे पेरेन्ट्स प्रेक्षक दिर्घा में नहीं बैठे थे, उनको इस इवेन्ट का हिस्सा बनाया गया!





हर छोटी छोटी चिज पे ध्यान दिया गया था चाहे वो ग्राउन्ड फ्लोर पे सब को एन्टरटेइन कर रहा स्टूडन्ट “मोगली” हो, चाहे वो शानदार “वेइटींग रूम्स” हो, चाहे वो “मुस्कुराइए – आप एस्टर में है” वाला स्माइली स्टीकर बोर्ड हो, चाहे वो प्लास्टीक ग्लास से बना स्नोमेन हो, चाहे वो सिढीयों की दिवारो पे सजाये मोटीवेशनल क्वोट्स हो या फिर आप के प्रतिभाव के लिए बना “पोस्ट इट” बोर्ड हो!




मैं नेक्षप्लोरा एवेन्ट से काफी प्रभावीत हुआ। ये पोस्ट एस्टर पब्लीक स्कूल के मार्केटींग के लिए या फिर मेरी बेटी उस स्कूल में पढ रही है इस लिए नहीं लिखा; मैंने इस लिए लिखा की इस तरह की इवेन्टस हर जगह होनी आवश्यक है। अगर स्कूल, कोलेज और कंपनीया भी इस तरह के इवेन्ट्स से प्रेरित हो तो स्टुडन्ट्स और एंप्लोयी इनोवेशन के प्रति उत्साहित नजर आएंगे तथा अपनी काबिलीयत दिखाने का अवसर मिलेगा! (और ये तभी संभव है जब ये पोस्ट आप अपने मित्र गण के साथे शेर करे और अपने सोशियल प्लेटफोर्म पर भी साझा करे। धन्यवाद!)





APS - 
नेक्षप्लोरा हर साल आयोजीत हो ऐसी आप से उम्मीद रखता हूं!
आप सभी मित्र गण को नव वर्ष २०२० के लिए अग्रीम शुभकामनाऍं! सुरक्षीत रहें, स्वस्थ रहें, व्यस्त रहें, मस्त रहें!
जय हिन्द!
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गोपाल खेताणी








Saturday, 16 November 2019

इंजीनियरींग, टेक्नीकल नॉलेज और जोब!


आज का युग चेलेन्जींग है। हर रोज कुछ न कुछ इनोवेशन हो रहा है। कल के बच्चे जो चंदामामा को देख रहे थे वे आज उनेके चेहरे के पीछे क्या है (डार्क साइड ओफ ध मून!) वो देखने लेन्डर को उनके पास भेज रहे है। कहने का मतलब ये है की हर जगह कुछ न कुछ नई संभावनाऍ देखी जा रही है।

पर पढाइ में कुछ नया पन आ रहा है? मैं कुछ पोइन्टस आप के सामने पेश करुंगा पर इससे पहले कुछ युवा इंजीनियर्स जो अभी अभी एम्पलोइ (फ़्रेशर्स) बने हैं उनके अनुभव पढते हैं।


मम्मी जल्दी खाना दो मेरी पहली क्लास केमिस्ट्री की है, अगर लेट हो गयी तो सर क्लास में आने नहीं देंगे! तभी मम्मी की आवाज़ आई, जल्दी उठ जा आज ऑफिस नहीं जाना क्या! और ये लो केमिस्ट्री की क्लास छूट गयी! एक और कॉलेज का सपना टूट गया! जब से कॉलेज ख़त्म हुआ है तब से मेरी सुबह कुछ ऐसे ही होती है। वैसे तो ऑफिस में सभी लोग बहुत अच्छे हैं पर कॉलेज की भी अपनी ही बात थी। अगर काम की बात की जाए तो यहाँ आने के बाद पता चला कि हम जो कुछ भी कॉलेज में पढ़ कर आए थे ज़माना उससे कई गुना आगे निकल चुका है। मोबाइल फोन इंटरनेट कंप्यूटर आदि के बाद भी हमें वो ज्ञान नहीं मिला जो कि हमारे जीवन को एक नए वातावरण में ढालने के लिए आवश्यक था। कई बच्चों को नौकरियाँ नहीं मिलीं, अच्छे अंक लाने के बाद भी। वहीं दूसरी तरफ़ कुछ ऐसे बच्चे भी थे जिन्हें इंजीनियर नहीं बनना था परंतु माता पिता की खुशी या दबाव के कारण इस क्षेत्र में आना पड़ा। उनका भविष्य क्या होगा पता नहीं। कहीं ना कहीं हमें ज़रूरत है कि हम अपनी शिक्षा प्रणाली में बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए उचित रूप से सुधार करें। यदि हमें कॉलेज में ही उन सोफ्टवेयरस की शिक्षा दी जाती जो कि हमारी इंजीनियरिंग ब्रांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जैसे कि ऑटो कैड,स्काडा,पी.एल.सी, माइक्रो स्टेशन आदि, तो नौकरियाँ पाना तथा नौकरी करना दोनों ही काम हमारे लिए सरल हो जाते। ऐसी महत्वपूर्ण चीज़ों को सीखने के लिए हमें अलग अलग कोचिंग क्लास में जाकर भारी फ़ीस व समय दोनों लगाने पड़ते हैं जबकि यही चीज़ें हम कॉलेज में ही सीख सकते थे। इसलिए केवल उतना ज्ञान ही काफी नहीं है जो कि हमने किताबों में लिख दिया और बच्चों को उसे याद करने के लिए स्कूल कॉलेज में भेज दिया, बल्कि समय के अनुसार उसे बदलना और सुधारना भी अति आवश्यक है। तथा हर कोई बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता, हर बच्चे में एक अलग गुण होता है, बस ज़रूरत है तो उसे समझने और निखारने की। भविष्य किसी ने नहीं देखा परंतु एक अच्छे भविष्य की कल्पना एक व्यवस्थित वर्तमान से ही शुरू होती है।
~ लोमशा

आज की दुनिया में एक सफल इंसान वही है जो अपने व्यवसाय और निजी जीवन में संतुलन बनाकर रखे। परंतु ऐसा कम लोग ही कर पाते हैं। लोग अपने व्यवसायिक जीवन में इतना खो जाते हैं कि परिवार को समय नहीं दे पाते। इसका एक कारण ये है कि जब वे कालेज में होते हैं तो उन्हें आने वाले समय से उतना परिचित नहीं कराया जाता जितना होना चाहिए। केवल किताबी ज्ञान उन्हें वास्तविक स्थिति के लिए तैयार नहीं कर पाता।

आजकल की शिक्षा प्रणाली में  परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। बच्चों को प्रैक्टिकल ज्ञान देने में बढ़ोतरी की काफी जरूरत है। किताबी ज्ञान केवल हमें विषय से रूबरू कराता है परंतु असल में हो क्या रहा है और कैसे हो रहा है ये उस कार्य को करने से ही पता चलता है। इसलिए कालेज में समय-समय पर वर्कशॉप आयोजित होते रहने चाहिए। व्यवसाय में जाकर एक इन्सान को किन परिस्थितियों का सामना करना होगा इसकी तैयारी कालेज में ही हो जानी चाहिए।
~नीरज सिंह

जब हम कॉलेज में होते हैं तो सिर्फ हमें यही सोचना होता है कि बस हमारे मार्क्स अच्छे आ जाएं और किसी अच्छी कंपनी में जॉब मिल जाए तथा जल्दी-जल्दी हमारी सैलरी भी बढ़ती रहें और हमारी पोस्ट भी। पर हम कभी यह नहीं सोच पाते कि जब हम कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाएंगे तो हमें किन किन बदलावों का परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है और ना ही हमारा कॉलेज हमें कॉलेज लाइफ से जॉब लाइफ में जाने के लिए तैयार करता है।
हम जब कॉलेज में होते हैं तो अगर हमें कोई विषय समझ नहीं आता तो हम एक अच्छे विद्यार्थी की तरह अपने शिक्षकों से विषय जाकर समझ लेते हैं पर इसके विपरीत जब हम जॉब में होते हैं और हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम यहां एक अच्छे कार्यकर्ता के रूप में बहुत से जाकर नहीं समझ सकते क्योंकि यहां यह साबित होगा कि हम उस कंपनी के ही लायक नहीं है। जब हम कॉलेज में होते हैं तब हम दोस्तों के साथ शिक्षकों के साथ बेझिझक अच्छे से वह सामान्य बर्ताव करते हैं इसके विपरीत जब हम जॉब लाइफ में आते हैं तो हमारे साथ काम करने वाले सहकर्मी और ज्यादातर ऐसे सहकर्मी जो वरिष्ठ होते हैं तो हमारा उनसे सामान्य बर्ताव नहीं हो पाता है। शुरुआत में तो काफी ज्यादा झिझक रहती है क्योंकि शुरुआत में हम लोग नए कार्यकर्ता होते हैं उनके यहां तो वह लोग हमारा काफी ज्यादा निरीक्षण करते हैं इसलिए हमें जरूरत है कि हम बच्चों को कॉलेज से ही जॉब लाइफ के लिए तैयारी करवाएं ताकि उन्हें कॉलेज से जॉब में जाने के बाद ऐसी परेशानियों का सामना ना करना पड़े।
~शालिनी मिश्रा


तो देखा आपने की युवा इंजीनियरों की कुछ समस्याए है। क्या कीया जाए उससे पहले मैं अपना अनुभव कहना चाहुंगा।

१९९९ में डीप्लोमा फेब्रीकेशन टेक्नोलोजीमें दाखिला लिया तब उस प्रोग्राम को पूरा रिडिफाइन किया था। (HOD जी.डी.आचार्य एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत की थी) इस डीप्लोमा की खास बात थी की लास्ट सेमेस्टर से पहले बच्चों को ६ - ६ महीने की (पूरा १ साल) दो कंपनी में ट्रेनींग होती थी। तो इस लिए व्यवसायिक जिवन में प्रवेश करने  से पहले हम पूरे तैयार हो जाते थे। मुजे तब भी ये लगा की कोलेज के पास इतने सारे मेन्युफेक्चरींग ड्रोइंग्स थे की वो कैसे पढे जाते हैं उनकी शिक्षा देते तो उन्हें कैसे तैयार करे जाते वो हम आसानी से समज पाते।

ठीक वैसा ही मैने डीग्री प्रोडक्शन इंजीनियरींग करते वक्त भी पाया। (HOD मंगल भट्ट एवम सभी प्रोफेसर्सने काफी महेनत कर नया करीक्युलम बनाया) यहां भी हमे ३ महीने की ट्रेनिंग लेनी थी जो कारगर साबीत हुइ। पर बात वहीं पे अटकी। जो चल रहा है इंडस्ट्री में वो तो हमें पता ही नहीं।

अब आते हैं सोल्युशन पर। तो सोल्युशन ये है की या तो कॉलेज अपने करीक्युलम में लगातार इम्प्रुवमेन्ट लाये (प्रेक्टीकल तौर पे) या फिर इंजीनियरिंग कम्प्लीट करने से पहले स्टुडन्ट को बाहर से ये ज्ञान लेना है ।

१ - सोफ्टवेर / हार्डवेर साइड डेवेलोप हो। कम्प्युटर का भी एड्वान्स लेवल नॉलेज होना बहुत ही जरूरी है। हर स्ट्रीम के जरूरी सोफ्टवेर के लेटेस्ट वर्जन का अनुभव छात्रों को मिले। 
२ - एक फूट में कितने मिलि मीटर, सेन्टी ंमीटर और इंच होते है ये अगर फाइनल यर स्टुडन्ट को मालुम  नहीं तो फिर उसे शिकायत करने का हक्क नहीं की उसे नौकरी नहीं मिल रही। ये सिर्फ एक उदाहरण है। बेझीक नॉलेज होना बहुत ही आवश्यक है जो मुझे लगता है बहुत ही कम छात्रों के पास है (शायद वो ही गंभीर है और उतने हीं चूने जाते हैं)।
३ - कॉलेज के बाहर ही रिआलीटी है वो समजने की और समजाने की जरूरत है। रंग दे बसंती का डीजे (आमिर खान) याद है न? "गुल्ल्बो..कॉलेज के गेट के इस तरफ हम जिंदगी को नचाते है.. डीम लक लक दे डीम लक लक.. और गेट के उस तरफ जिंदगी हम को नचाती है.. डीम लक लक दे डीम लक लक...।" 
४ - कोन्फीडन्ट होना अच्छी बात है पर ओवर कोन्फीडन्स और एटीट्युड आप को जोखीम में डाल सकते है! और इस में झहर घोल सकता है आपका प्रोपर कम्युनिकेशन का अभाव। अगर आप अच्छे से अपने आप को, अपनी नॉलेज को एक्स्प्रेस नहीं कर पाते तो सिलेक्शन होना या फिर प्रमोट होना मुश्किल है।
५ - सेलरी से ज्यादा ध्यान काम पर और अपने चोइस की फिल्ड पर दे। मुजे मेन्युफेक्चरींग पसंद है पर डीझाइन (इपीसी) आज कल ज्यादा सेलरी दे रही है तो मैं उसमे चला जाता / चली जाती हूं - ये सोच लंबे केरीयर ग्राफ के लिए उचित नहीं है। शुरु के दो साल सिर्फ आप सिखने में बिताए; ना की सेलरी गिनने में। बाबा रणछोड दास चांचड उर्फ रेन्चोने कहा था की "दोस्त, एक्सलंस के पीछे भागो, सक्सेस जख मार के पीछे आएगी!"

अब विश्राम... कुछ और पोइंट्स बाद में। अगर कोइ कॉलेज के प्रोफेसर्स इस आर्टीकल को पढ रहे है तो गुजारीश है की छात्रों को प्रेक्टीकल ज्ञान बांटीए, ज्यादा से ज्यादा वर्कशोप्स और छोटी ही सही पर ट्रेनींग करवाइए।

और फाइनल और प्रिफाइनल यर्स स्टुडंट्स एवम न्यु जोइनीझ, आप बेझीक्स पर ध्यान दिजीए। कुछ पैसे नये कोर्सीस सिखने में भी लगाइए, ये भी आप का एक इन्वेस्टमेंट है। (खुद का एक्सपिरीयंस है!)

ओल ध बेस्ट ! और हां "आल इज वेल" :)  हंमेशा याद रखीएगा!!!

~ गोपाल खेताणी

Tuesday, 22 October 2019

दिवाली – कल आज और कल !


"दिवाली" – ये शब्द कानो में गूंजते ही रंगबिरंगी आभा सब के मनोपटल पर छा जाती है। यह कल्पना अमीर -गरीब, बच्चे – बुढ्ढे – जवान  के बीच अंतर नहीं देखती!

और यही खुशी आप उपर वाली फोटो में देख सकते हो! एस्टर पब्लीक स्कूल में केजी के बच्चोने सब के साथ दिवाली मनाइ! अपने पारंपरीक वस्त्रो में सज धज कर आये बच्चो को टिचरने रंगोली, दिए का महत्व बताया और दिवाली के त्योहार का उत्साह इन नन्हे मुन्ने बालको के मन मंदीर में जिवीत कीया!
(फोटो कर्टसी - एस्टर पब्लीक स्कुल, मयुर विहार, दिल्ही। साभार - दिव्या मेडम) 
अभी तो दिवाली यानी ओनलाइन सेल से खचाखच भरा हुआ बाझार। (ओफलाईन बाजार में भले ही मंदी हो, ओनलाईन अरबो रूपये  कमा लेता है!) अभी तो दिवाली यानी शोपींग मॉलमें लुत्फ उठाने का त्योहार!
दिवाली का मतलब छुट्टियां है तो घर पर ताला लगाने का मौका! (और तस्करशास्त्रीयों का भी!)  हम घर पर हो तो मेहमान आएंगे न? कौन घर पर पकवान बनाएं, मिठाइयां बनाएं, गुजीया बनाएं, घर सजाएं?? छुट्टीयां मिली है तो घूम लेते है कहीं!
ऊपर वर्णित "दिवाली"    सर्व व्यापक नहीं हैलेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार हो रहा है।
क्या मेरी बातें  निराशाजनक लगती हैंचलो कुछ अच्छी बातें करते है। आपको अतीत में डुबकी लगाने ले चलता हूं।
बात शरु करने से पहले बता दुं की गुजराती नव वर्ष दिवाली के दूसरे दीन से शुरु होता है। हम गुजरातीयों के लिए (सब की तरह) दिवाली बहुत मायने रखती है! अब आता हुं मुद्दे पर;
स्थलः 'अनुपम वस्तु भंडार', गुंदावाडीराजकोट, गुजरात। समयखंड 1995-2005
वैसे तो पापा की यह दुकान सिर्फ बुक – स्टेशनरी की है पर पटाखे बेचने का स्थायी लाइसन्स होने पर हम पटाखे बेचते थे। दुकान मेइन मार्केट रोड से थोडी दूर अंदरवाली गली में है। पापा को आसपास में रहते सभी बच्चे “अनुपम” नाम से बुलाते थे क्युंकी उन्हें लगता था की दुकान का नाम मेरे पापा के नाम पर से ही होगा। आज वो बच्चे ३५-४० साल के आसपास होंगे। खैर दिवाली के पांच  - छह दिन पहले  हम पटाखो की बिक्री शरु कर देते थे। जैसा मैने पहले बताया की गुजरातीयों का नववर्ष होता है तो स्कुल में दिवाली की २० दिन की छुट्टी मिलती थी। मैं तब १२ – १३ साल का था और खुशी खुशी पटाखे बेचने दुकान पर जाता था। (लोहाणा के खुन में ही बिझनेस होता है!) 
कई बच्चे दुकान के पास बहुत चक्कर लगाते और पटाखो के रंगीन पोस्टर देख अपनी कल्पना के रंग उसमें भरते। ये बच्चे हमारी बुक – स्टेशनरी के विश्वासु एवम रोजाना कस्टमर थे। (पेन्सील – इरेझर वाले!)
पटाखो के पेकेट मे से कई बार फुलजडी निकल पडती या अनार, जमीन चक्कर पर से रंगीन कागझ निकल जाते। उन पटाखों को पापा एक अलग बक्से में रख देते। मुजे याद है की एक बार एक छोटु पांच का सिक्का ले के दुकान पे आया। पांच का सिक्का मेरे पापा को देकर एक्दम खुशी खुशी तोतलाते हुए बोला, “ अनुपम, पांत ना फटाकीया” – मतलब पांच के पटाखे। और उस के बाद अपनी दोनो कोन्ही टेबल पर टीका उसपे अपना मुंह फिक्स कर सभी पटाखों को आराम से देख रहा था। पापा ने वो जो अलग बक्से में पटाखे रखे थे उसमे से कुछ् पटाखे निकाल उसको दिए। वो पटाखों की किंमत सन २००० के हिसाब से १५ – २० रुपये होगी। मैने फिर पापा की और देखा। वो बोले उसके पापा बगल वाली साबुन की फेकट्री में मझदूर है। इस छोटु को भी तो दिवाली मनानी होगी ना? हां पैसे इस लिए मैने लिये ताकी उसे ये विश्वास रहे की पटाखे मुफ्त में नहीं मिलते। पापा दुकान पे आते भिखारी को भी ऐसे ही उस बक्से में से कुछ दे देते थे। भिखारी के बच्चों की मुस्कान देखने लायक बनती। यहां पर मैं अपने पापा की वाहवाही नहीं कर रहा  और ना ही भिखारीओ को उत्तेजन देने की बात कर रहा हूं। मैं बस इतना कहना चाहता हूं की हम कुछ ऐसा कर पाए की और लोग भी हमारे साथ त्योहार मना पाए।
आज अगर सो रुपये लेकर बाझार में जाकर पटाखे मांगो तो व्यापारी हस देगा। पर तब ऐसा नहीं था। उस समय हम बीस – तीस रुपये के पटाखे भी बोक्स में से निकाल कर दे देते थे। मुख्य उद्देश्य व्यापार करने के साथ मस्ती भुनने का भी था। और ये सीर्फ हम नहीं सभी व्यापारी ऐसा करते थे।
उस समय सब को अपने बजट के अनुसार त्योहार मनाना आता था। उस समय औरते पुराने कपडों के बदले नये बर्तन ख्ररीदती थी। इस ‘एक्स्चेंज’ ओफर का अपने पडोशीयों के साथ ‘ग्रुप डिस्कशन’ करती थी। सडकों के किनारे बैठे हुए रंगोली , दीए वाले के पास से खरीददारी होती थी। लाइटों की चमचमाती रोशनी देखने लोग बाझारों में घूमने निकलते थे। रेडी एवम दुकानो से जूते , चप्पल, कपडें, साज सजावट के सामान खरीदे जाते। दिवाले के दिन अशोक व्रुक्ष (आसोपालव) के पत्ते से बने तोरण (लडी) की खरीददारी होती है। दुसरे दीन नववर्ष पे सब बच्चे तैयार हो कर आस पडोश और सगे – संबंधीओ के घर पर जा के पैर छूते हैं और उनसे आशीर्वाद (लक्ष्मीजी भी! ) पाते। घर के सभी सदस्य मंदीर जा कर फीर एक दूसरे को बधाई देने पहुंचते।
पहले मिट्टी के दिए बेचती बुढ्ढी अम्मा से लेकर सबरस (नमक) बेचते हुए चाचा तक सब दिवाली मनाते थे। उस समय लारी – रेडी में से खरीदने में कोई असहज महसूस नहीं करता था। छोटी छोटी चिजो में कोई क्वालीटी का सवाल भी नहीं होता था।
मगर आज हम क्या कर रहे है? हम किसी के त्योहार की खुशीया छीन तो नहीं रहे ना? ओनलाइन शोपींग और मॉल के चक्कर में कइ लोगों के दिये नहीं जल पाते।
चलो इस दिवाली पे हम औरो की खुशी में भी शामिल होते है। इस दिवाली सब को साथ लेकर चलते है। बच्चे – बुढ्ढे कीसी के दिल को चोट ना लगे ये संकल्प लेते है।
आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाऍ सुरक्षीत रहें , स्वस्थ रहें!
-    गोपाल खेताणी

Sunday, 13 October 2019

D से डिसीप्लीन


“परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन – ये गुरुकुल के तिन आधार स्तंभ है” एसा हमने कुछ महानायक से महोब्बते मुवि में सुना था।
सहि मायनो में हमे अनुशासन यानी डिसीप्लीन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। ऐसा सुना है की सरदार पटेलने आझादी के तुरंत बाद कहा था की कुछ समय तक देशमें सरमुखत्यार शाही शासन होन चाहीये क्युंकी देश की जनता अभी अनुशासीता नहीं है। और ये बात अभी सच भी लग रही है।
नियमो की न परवाह है हमें और न ही कानुन के उल्लंघन का खौफ!
तीन तरह के लोग अनुशासीत नहीं है।
१ – पैसा और पावर है
२ – निम्न स्तरीय, जो शोर्ट कट के आदी है
३ – जो अनुशासन से अंजान है
समस्या
-    सब अपने देश की तूलना विकसीत देश से करते है, पर हम अपनी तुलना वहां की प्रजा से क्युं नहीं करते?
-    ट्रेन और बस में सफर किया होगा तो पता चल जाता है की कुछ लोगों की जागिर बनी क्युं नहीं? क्युंकी ये देश की जागिर का भी इतना बुरा हाल करते हैं कि अपनी जागिर का तो क्या हि किया होगा ये पता चल जाता है।
-    ट्राफिक के नये नियम से परेशान हो गई जनता को ये नहीं मालूम की फूटपाथ पर वाहन नहीं चलाए जाते। वाहन चलाते समय गुट्खा नहीं थुकते, मोबाइल पे बात नहीं करते, इन्डीकेटर देना आवश्यक है, दारु पी के नहीं चलाना।
-    जहां जहां भंडारा, पूजा या उत्सव होता है वहाम भिड जैसे बेकाबु हो जाती है। हर कोई अपना सोच दूसरो से आगे निकलने में लग जाता है।
-    कुछ लोग अच्छा अंग्रेजी जाड लेते है तो उन्हें लगता है कि हम नियम तोड सकते है।
-    कुछ लोग जो गरीब है तो उन्हें लगता है की उन्हें नियम से छूट मिलनी चाहीए।
-    कुछ लोग जिन्हें नियम मालुम हि नहीं उन्हे लगता है कि नियम न जानने की वजह से उन्हें तो सजा मिलनी ही नहीं चाहीए।
वाह रे देश…वाह रे मेरे भारतवासी!
उपायः
कुछ देशो की तरह हमारे यहां भी मिलिट्री ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहीए। बच्चों को शिक्षा में अनुशासन – डिसिप्लिन का एक विशेष विषय होना चाहिए। तहजीब हमें घर से सिखानी होगी। पैसा और पावर का दुरुपयोग अंत मे दुःखद हि होगा ये समजना चाहीए। समाज के निचले वर्ग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अगर उन्हें अनुशासीत कीया गया तो उनका विकास अपने आप होगा।

अंत में कुछ सवाल
-    क्या गलीयों और रोड पे अपनी गाडीयां पार्क करना जायझ है?
-    सडक के किनारे लारी – रेडीं खडी कर देना जायझ है?
-    जहां जगह देखी वहां झुग्गी – झोंपडी बसा देना जायझ है?
-    कहीं पर भी थूंकना, कचरा डालना, शौच करना जायझ है?
-    आप के पास मर्सीडीझ है इस लिए साईड न देना जायझ है?
-    ट्राफीक जाम में राइटसाइड से ओवरटेक करते हुए और ट्राफीक बढाना जायझ है?
-    एम्ब्युलन्स कहीं और से निकल जायेगी, मुझे क्या? ये सोचते हुए जगह न देना जायझ है?
याद रखीए D se Discipline की हम सबको आवश्यकता है।
- गोपाल खेताणी

Tuesday, 1 October 2019

नवरात्रि – शक्ति स्वरुपा की आराधना का त्योहार



सब से लंबे चलने वाले इस भारतीय त्योहार की खास बात ये है की ये कोई एक विशिष्ट प्रांत का त्योहार ना रहकर पूरे देशमें मनाय जाता है। हां, ये जरूर है की त्योहार मनाने की रीत-रस्म अलग है पर मक्सद एक है और वो है, शकित स्वरूपा की आराधना कर उसके आशिर्वाद ग्रहण करना।
पौष, चैत्र, अषाढ और अश्विन – ये चार नवरात्रों में से अश्विन नवरात्रि बडी धूमधाम से मनायी जाती है!
बंगाल की कालीपूजा से लेकर गुजरात के गरबा एवं दांडीया, उत्‌तर भारत की दुर्गा पूजा से लेकर दक्षीण में लक्ष्मी पूजा तक, नवरात्रोमें नौ देवीयों के आशिर्वाद लिए जाते हैं।
ये नौ देवियाँ  इस प्रकार है :-
·         शैलपुत्री - इसका अर्थ- पहाड़ों की पुत्री होता है।
·         ब्रह्मचारिणी - इसका अर्थ- ब्रह्मचारीणी।
·         चंद्रघंटा - इसका अर्थ- चाँद की तरह चमकने वाली।
·         कूष्माण्डा - इसका अर्थ- पूरा जगत उनके पैर में है।
·         स्कंदमाता - इसका अर्थ- कार्तिक स्वामी की माता।
·         कात्यायनी - इसका अर्थ- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
·         कालरात्रि - इसका अर्थ- काल का नाश करने वली।
·         महागौरी - इसका अर्थ- सफेद रंग वाली मां।
·         सिद्धिदात्री - इसका अर्थ- सर्व सिद्धि देने वाली।

गुजरात में नवरात्रि का विशिष्ट महत्व है।
नवरात्रों के दौरान गुजरात के घरोमें एवं मंदीरोमें घट स्थापन होता है! मिट्टी का छेद वाला कलश जीसे ‘गरबा’ बोलते हैं उसे स्थापित कीया जाता है। नौ दिन नौ रात तक उसमें ज्योत जगाइ जाती है और दशवे दिन ‘गरबा’ का विसर्जन होता है!
गरबा ब्रह्मांड का प्रतिक माना जाता है। गरबे में २७ छेद होते है। ९ छेद वाली तीन रेखाएं यानी २७ छेद. २७ छेद यानी २७ नक्षत्र. २७ नक्षत्र के चार चरण होते है। २७ X ४ = १०८। १०८ संपूर्ण अंक है जो ब्रह्मांड का अंक माना जाता है। नवरात्रि के ये नौ दिन गरबा की प्रदक्षिणा करते है उन्हें ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा करने का पुण्य मिलता है ऐसा माना जाता है। पर गरबा के आसपास ये खास न्रुत्य क्युं करते है?
मां दुर्गाने नौ दिन नौ रात तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवे दिन उसका वध किया। इसी कारण नौ रात तक मातारानी के भक्ति गीत गाये जाते है, और “गरबा” के आस पास एक अलग अलग प्रकार के ‘रास’ (न्रुत्य) होते है जो अब “गरबा” के नाम से मशहूर है। उसे आधुनीकीकरण में प्रस्तुत कर डांडीया कर दीया है मगर वो गरबा नहीं होकर सिर्फ व्यक्तीगत मनोरंजन है। पूरी दुनिया में गुजरात के डांडीया मशहूर है, मगर वो डांडीया और मां की आराधना का कोई लेना देना नहीं है।


जैसे आगे बताया की नवरात्रिमें मां की अर्चना के लिए जो ‘रास’ किए जाते हैं वे छोटी बच्चीयां एवं कन्याओ के द्वारा होते है और उन्हें ‘रास – गरबा’ का अभ्यास करवाया जाता है। उनको उस नौ दिन देवीमां का स्वरुप माना जाता है। नौ दिन तक उन्हे उपहार दिये जाते हैं। इस उपहार को “ल्हाणी” कहते है। “ल्हाणी” देने वाले खुद को धन्य समजते है। ये कन्याएं जो मां का स्वरुप है वो अदभुत गरबा रास प्रस्तुत करती है। गरबा रास को ‘गरबी’ के नाम से भी जाना जाता है। लडकों को भी कुछ विशिष्ट प्रकार के रास के लिए अभ्यास करवाया जाता है जैसे की तलवार रास, मशाल रास। सोशियल मिडियामें आप मशाल रास, तलवार रास, डाकला, दिया रास खोजकर देख सकते हैं। ये प्राचीन कला अब भी मातारानी के भक्तो की आस्था से गुजरात के पश्चीमी प्रांत; सौराष्ट्र और कच्छ में जीवंत है। अगर नवरात्रि के दिनो में गुजरात जाइए तो ये गरबा जरूर देखीएगा।
 जय माता दी।
~
गोपाल खेताणी

परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद

अब्दुल हमीद   का जन्म  1 जुलाई , 1933 को   यूपी के गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में   हुआ था।   उनके पिता मोहम्मद उस्मान सिलाई का काम करते थे...