Monday, 21 October 2019

दिवाली – कल आज और कल !


"दिवाली" – ये शब्द कानो में गूंजते ही रंगबिरंगी आभा सब के मनोपटल पर छा जाती है। यह कल्पना अमीर -गरीब, बच्चे – बुढ्ढे – जवान  के बीच अंतर नहीं देखती!

और यही खुशी आप उपर वाली फोटो में देख सकते हो! एस्टर पब्लीक स्कूल में केजी के बच्चोने सब के साथ दिवाली मनाइ! अपने पारंपरीक वस्त्रो में सज धज कर आये बच्चो को टिचरने रंगोली, दिए का महत्व बताया और दिवाली के त्योहार का उत्साह इन नन्हे मुन्ने बालको के मन मंदीर में जिवीत कीया!
(फोटो कर्टसी - एस्टर पब्लीक स्कुल, मयुर विहार, दिल्ही। साभार - दिव्या मेडम) 
अभी तो दिवाली यानी ओनलाइन सेल से खचाखच भरा हुआ बाझार। (ओफलाईन बाजार में भले ही मंदी हो, ओनलाईन अरबो रूपये  कमा लेता है!) अभी तो दिवाली यानी शोपींग मॉलमें लुत्फ उठाने का त्योहार!
दिवाली का मतलब छुट्टियां है तो घर पर ताला लगाने का मौका! (और तस्करशास्त्रीयों का भी!)  हम घर पर हो तो मेहमान आएंगे न? कौन घर पर पकवान बनाएं, मिठाइयां बनाएं, गुजीया बनाएं, घर सजाएं?? छुट्टीयां मिली है तो घूम लेते है कहीं!
ऊपर वर्णित "दिवाली"    सर्व व्यापक नहीं हैलेकिन धीरे-धीरे इसका विस्तार हो रहा है।
क्या मेरी बातें  निराशाजनक लगती हैंचलो कुछ अच्छी बातें करते है। आपको अतीत में डुबकी लगाने ले चलता हूं।
बात शरु करने से पहले बता दुं की गुजराती नव वर्ष दिवाली के दूसरे दीन से शुरु होता है। हम गुजरातीयों के लिए (सब की तरह) दिवाली बहुत मायने रखती है! अब आता हुं मुद्दे पर;
स्थलः 'अनुपम वस्तु भंडार', गुंदावाडीराजकोट, गुजरात। समयखंड 1995-2005
वैसे तो पापा की यह दुकान सिर्फ बुक – स्टेशनरी की है पर पटाखे बेचने का स्थायी लाइसन्स होने पर हम पटाखे बेचते थे। दुकान मेइन मार्केट रोड से थोडी दूर अंदरवाली गली में है। पापा को आसपास में रहते सभी बच्चे “अनुपम” नाम से बुलाते थे क्युंकी उन्हें लगता था की दुकान का नाम मेरे पापा के नाम पर से ही होगा। आज वो बच्चे ३५-४० साल के आसपास होंगे। खैर दिवाली के पांच  - छह दिन पहले  हम पटाखो की बिक्री शरु कर देते थे। जैसा मैने पहले बताया की गुजरातीयों का नववर्ष होता है तो स्कुल में दिवाली की २० दिन की छुट्टी मिलती थी। मैं तब १२ – १३ साल का था और खुशी खुशी पटाखे बेचने दुकान पर जाता था। (लोहाणा के खुन में ही बिझनेस होता है!) 
कई बच्चे दुकान के पास बहुत चक्कर लगाते और पटाखो के रंगीन पोस्टर देख अपनी कल्पना के रंग उसमें भरते। ये बच्चे हमारी बुक – स्टेशनरी के विश्वासु एवम रोजाना कस्टमर थे। (पेन्सील – इरेझर वाले!)
पटाखो के पेकेट मे से कई बार फुलजडी निकल पडती या अनार, जमीन चक्कर पर से रंगीन कागझ निकल जाते। उन पटाखों को पापा एक अलग बक्से में रख देते। मुजे याद है की एक बार एक छोटु पांच का सिक्का ले के दुकान पे आया। पांच का सिक्का मेरे पापा को देकर एक्दम खुशी खुशी तोतलाते हुए बोला, “ अनुपम, पांत ना फटाकीया” – मतलब पांच के पटाखे। और उस के बाद अपनी दोनो कोन्ही टेबल पर टीका उसपे अपना मुंह फिक्स कर सभी पटाखों को आराम से देख रहा था। पापा ने वो जो अलग बक्से में पटाखे रखे थे उसमे से कुछ् पटाखे निकाल उसको दिए। वो पटाखों की किंमत सन २००० के हिसाब से १५ – २० रुपये होगी। मैने फिर पापा की और देखा। वो बोले उसके पापा बगल वाली साबुन की फेकट्री में मझदूर है। इस छोटु को भी तो दिवाली मनानी होगी ना? हां पैसे इस लिए मैने लिये ताकी उसे ये विश्वास रहे की पटाखे मुफ्त में नहीं मिलते। पापा दुकान पे आते भिखारी को भी ऐसे ही उस बक्से में से कुछ दे देते थे। भिखारी के बच्चों की मुस्कान देखने लायक बनती। यहां पर मैं अपने पापा की वाहवाही नहीं कर रहा  और ना ही भिखारीओ को उत्तेजन देने की बात कर रहा हूं। मैं बस इतना कहना चाहता हूं की हम कुछ ऐसा कर पाए की और लोग भी हमारे साथ त्योहार मना पाए।
आज अगर सो रुपये लेकर बाझार में जाकर पटाखे मांगो तो व्यापारी हस देगा। पर तब ऐसा नहीं था। उस समय हम बीस – तीस रुपये के पटाखे भी बोक्स में से निकाल कर दे देते थे। मुख्य उद्देश्य व्यापार करने के साथ मस्ती भुनने का भी था। और ये सीर्फ हम नहीं सभी व्यापारी ऐसा करते थे।
उस समय सब को अपने बजट के अनुसार त्योहार मनाना आता था। उस समय औरते पुराने कपडों के बदले नये बर्तन ख्ररीदती थी। इस ‘एक्स्चेंज’ ओफर का अपने पडोशीयों के साथ ‘ग्रुप डिस्कशन’ करती थी। सडकों के किनारे बैठे हुए रंगोली , दीए वाले के पास से खरीददारी होती थी। लाइटों की चमचमाती रोशनी देखने लोग बाझारों में घूमने निकलते थे। रेडी एवम दुकानो से जूते , चप्पल, कपडें, साज सजावट के सामान खरीदे जाते। दिवाले के दिन अशोक व्रुक्ष (आसोपालव) के पत्ते से बने तोरण (लडी) की खरीददारी होती है। दुसरे दीन नववर्ष पे सब बच्चे तैयार हो कर आस पडोश और सगे – संबंधीओ के घर पर जा के पैर छूते हैं और उनसे आशीर्वाद (लक्ष्मीजी भी! ) पाते। घर के सभी सदस्य मंदीर जा कर फीर एक दूसरे को बधाई देने पहुंचते।
पहले मिट्टी के दिए बेचती बुढ्ढी अम्मा से लेकर सबरस (नमक) बेचते हुए चाचा तक सब दिवाली मनाते थे। उस समय लारी – रेडी में से खरीदने में कोई असहज महसूस नहीं करता था। छोटी छोटी चिजो में कोई क्वालीटी का सवाल भी नहीं होता था।
मगर आज हम क्या कर रहे है? हम किसी के त्योहार की खुशीया छीन तो नहीं रहे ना? ओनलाइन शोपींग और मॉल के चक्कर में कइ लोगों के दिये नहीं जल पाते।
चलो इस दिवाली पे हम औरो की खुशी में भी शामिल होते है। इस दिवाली सब को साथ लेकर चलते है। बच्चे – बुढ्ढे कीसी के दिल को चोट ना लगे ये संकल्प लेते है।
आप सब को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाऍ सुरक्षीत रहें , स्वस्थ रहें!
-    गोपाल खेताणी

Saturday, 12 October 2019

D से डिसीप्लीन


“परंपरा, प्रतिष्ठा और अनुशासन – ये गुरुकुल के तिन आधार स्तंभ है” एसा हमने कुछ महानायक से महोब्बते मुवि में सुना था।
सहि मायनो में हमे अनुशासन यानी डिसीप्लीन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। ऐसा सुना है की सरदार पटेलने आझादी के तुरंत बाद कहा था की कुछ समय तक देशमें सरमुखत्यार शाही शासन होन चाहीये क्युंकी देश की जनता अभी अनुशासीता नहीं है। और ये बात अभी सच भी लग रही है।
नियमो की न परवाह है हमें और न ही कानुन के उल्लंघन का खौफ!
तीन तरह के लोग अनुशासीत नहीं है।
१ – पैसा और पावर है
२ – निम्न स्तरीय, जो शोर्ट कट के आदी है
३ – जो अनुशासन से अंजान है
समस्या
-    सब अपने देश की तूलना विकसीत देश से करते है, पर हम अपनी तुलना वहां की प्रजा से क्युं नहीं करते?
-    ट्रेन और बस में सफर किया होगा तो पता चल जाता है की कुछ लोगों की जागिर बनी क्युं नहीं? क्युंकी ये देश की जागिर का भी इतना बुरा हाल करते हैं कि अपनी जागिर का तो क्या हि किया होगा ये पता चल जाता है।
-    ट्राफिक के नये नियम से परेशान हो गई जनता को ये नहीं मालूम की फूटपाथ पर वाहन नहीं चलाए जाते। वाहन चलाते समय गुट्खा नहीं थुकते, मोबाइल पे बात नहीं करते, इन्डीकेटर देना आवश्यक है, दारु पी के नहीं चलाना।
-    जहां जहां भंडारा, पूजा या उत्सव होता है वहाम भिड जैसे बेकाबु हो जाती है। हर कोई अपना सोच दूसरो से आगे निकलने में लग जाता है।
-    कुछ लोग अच्छा अंग्रेजी जाड लेते है तो उन्हें लगता है कि हम नियम तोड सकते है।
-    कुछ लोग जो गरीब है तो उन्हें लगता है की उन्हें नियम से छूट मिलनी चाहीए।
-    कुछ लोग जिन्हें नियम मालुम हि नहीं उन्हे लगता है कि नियम न जानने की वजह से उन्हें तो सजा मिलनी ही नहीं चाहीए।
वाह रे देश…वाह रे मेरे भारतवासी!
उपायः
कुछ देशो की तरह हमारे यहां भी मिलिट्री ट्रेनिंग अनिवार्य होनी चाहीए। बच्चों को शिक्षा में अनुशासन – डिसिप्लिन का एक विशेष विषय होना चाहिए। तहजीब हमें घर से सिखानी होगी। पैसा और पावर का दुरुपयोग अंत मे दुःखद हि होगा ये समजना चाहीए। समाज के निचले वर्ग पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। अगर उन्हें अनुशासीत कीया गया तो उनका विकास अपने आप होगा।

अंत में कुछ सवाल
-    क्या गलीयों और रोड पे अपनी गाडीयां पार्क करना जायझ है?
-    सडक के किनारे लारी – रेडीं खडी कर देना जायझ है?
-    जहां जगह देखी वहां झुग्गी – झोंपडी बसा देना जायझ है?
-    कहीं पर भी थूंकना, कचरा डालना, शौच करना जायझ है?
-    आप के पास मर्सीडीझ है इस लिए साईड न देना जायझ है?
-    ट्राफीक जाम में राइटसाइड से ओवरटेक करते हुए और ट्राफीक बढाना जायझ है?
-    एम्ब्युलन्स कहीं और से निकल जायेगी, मुझे क्या? ये सोचते हुए जगह न देना जायझ है?
याद रखीए D se Discipline की हम सबको आवश्यकता है।
- गोपाल खेताणी

मेरा भारत महान – चन्द्रशेखर सीताराम तिवारी

'दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे।'   आज उस महान सेनानी की जन्म जयंती है जिन्होंने महज १...